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Friday, 14 April 2017

Information और Knowledge में क्या अंतर है..??(What is the difference between Information and knowledge)

Information और Knowledge में क्या अंतर है..??
जानिये एक प्रेरणादायी अंदाज में...

जानकारी तो हम बचपन से ही इकठ्ठा करते आएं हैं,
जब हम nursery class में पढ़ते थे तो हमारे teacher हमें बैठना सिखाते थे, फिर पांचवी class तक आते आते हमें भूगोल और इतिहास की जानकारी दी जाने लगी थी;
और अब; जब हम college में पढ़ रहे हैं तब भी जानकारी इकट्ठी किये जा रहे हैं और हम sinθ+Cosθ =1 से कहीं आगे निकल चुके हैं।
दुनियाँ भर की जानकारी(information) हो गई है अब हमें।

लेकिन अगर बात knowledge की, की जाए तो..??

Sorry for that; but मैं कहना चाहूंगा कि हमने जितनी भी जानकारी इकठ्ठा की है उसकी 10% भी knowledge नहीं है।
क्योंकि...
याद करो वो दिन; जब हमें नैतिक कर्तव्य (moral value) का पाठ पढ़ाया जाता था और हमें उस पाठ में बताया जाता था कि हमें माता-पिता की सेवा करना चाहिये और अनुशाशन का पालन करना चाहिए।
Teacher ने तो स्कूल में केवल हमें जानकारी(information) दी थी कि माता-पिता की सेवा करना चाहिए;
लेकिन उस जानकारी को ज्ञान(ज्ञान) में तभी convert किया जा सकता था जब हम real में घर आकर माता-पिता की सेवा करते।
बस यही difference तो है information & knowledge में।
लेकिन तब, घर आते ही हम school की बातें school में ही छोड़ आते थे क्योंकि हम समझते थे कि ये बातें तो बस exams में लिखने के लिए होती हैं।
फिर माता-पिता की सेवा करना तो दूर; उलट उनसे रोज किसी ना किसी बात को लेकर डाँट ही खाते थे।
खैर, वो तो एक बचपन था; हम समझदार नहीं थे लेकिन अगर बात वर्तमान की; की जाए तो कितने हद तक हमें knowledge है!!!
कितनी सेवा करते हैं अपने माँ-बाप की..??

अगर हम आज भी अपने माता-पिता की सेवा करते हैं तो वास्तव में हम एक; strong knowledge रखते हैं और एक चरित्रवान व्यक्ति हैं।

अगर real में माँ-बाप की सेवा नहीं करते हैं तो  क्या फायदा है उस जानकारी का जो जिंदगी में किसी काम ही नहीं आती।
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चलो अब बचपन की नैतिक कर्तव्य की किताब छोड़ो।
अब बात करते हैं एक निबंध (essay) की, 👍जो हमने बारहवीं class में सीखा था और exams में उसके बारे में अच्छे से explain भी किया था।
उस निबंध का नाम था :
दहेज - एक सामाजिक अभिशाप।
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इस निबंध में हमने दहेज़ के बारे में जाना कि इसका लेन-देन क्यों बेकार है और यह किस तरह हमारे समाज को खोखला किये जा रहा है।
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शायद, तब भी हमने उस निबंध के बारे में इसलिए जानकारी इकठ्ठा की ताकि सिर्फ exam में अच्छे से explain करके, अच्छे marks बटोर सकें।
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सिर्फ information को अपने पास रखना महानता नहीं है, महानता तो उस information को knowledge में convert करने में है।
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ठीक इसी तरह, दहेज के बारे में हमें जो जानकारी है उसे अगर समाज से हटाना है तो life में Apply करो और अगर किसी को दहेज़ लेने से नहीं रोक सकते तो कम से कम अपनी शादी में ना लेने की प्रतिज्ञा करें।
तभी सार्थक रूप से हम अपनी information को knowledge में convert कर सकते हैं।
क्योंकि "knowledge is better than information"
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जय हिंद।

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Monday, 13 March 2017

Behind the reason of i am fine!!

आखिर परेशान होने के बावजूद भी क्यों कहतें हैं लोग; कि मस्त हूँ..!!
जानिये reason...!!


आज हर किसी की जिंदगी में परेशानी नामक शब्द ने अपनी जगह बना ली है..!!!
●अगर आज कोई आपका हालचाल पूछता है तो आप मस्त हो कहकर फिर उसका हाल पूछने लगते हो...जबकि आपकी जिंदगी में मस्त का 'म' भी नहीं होता है।
''यह Article आप technic jagrukta वेबसाइट पर पढ़ रहे हैं''
खैर, आपने कभी सोचा है कि आप हमेशा सभी से; मस्त हैं, ठीक हैं, अच्छे हैं आदि। क्यों कहते हो..??
जबकि आपकी जिंदगी में कुछ और ही चल रहा होता है।
कुछ ही ऐसे लोग होंगे जो सभी को अपना वास्तविक हाल बताते होंगें..!!
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अगर गहराई से सोचा जाये तो हर मुश्किल का हल निकल ही आता है..!!
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चलो आज इसी बात की गहराई में चलते हैं कि हम परेशान होने के बावजूद भी किसी के द्वारा पूछे जाने पर ठीक हैं; क्यों कहतें हैं..???
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हालाँकि इसका जवाब थोड़ा complicated है but उतना ही effective.
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ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सामने वाले ने अगर प्रश्न किया कि भाई कैसे हो..???
तो दरअसल आप बताना चाहते हों कि आपकी जिंदगी में वाकई ही बहुत problems हैं...
लेकिन रुक जाते हो क्योंकि आपकी problems को आप कुछ ही शब्दों में बयाँ करना नहीं चाहते हो अगर आपने अपनी problems बताना start किया तो काफी समय लग जाएगा और शायद दूसरा भी upset हो जाएगा।
फिर भी इस बात की कोई जवाबदेही नहीं कि solution भी मिल ही जाएगा।
ये सारी बातें सिर्फ 5 सेकंड के अंदर ही दिमाग में चक्कर लगा देती हैं
और फिर आप दिल से ना बताकर दिमाग से बोलते हो कि भाई अच्छा हूँ..!!😊😊
क्योंकि इसके बाद उस व्यक्ति के पास; पूछने को कोई दूसरा प्रश्न; बचा ही कहाँ..??
इसीलिए आजकल; क्या हाल है..?? का common reply "मस्त हूँ" बन गया है।😊😊

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अब दूसरी बात को लेते हैं...
अगर आप बोले कि मस्त नहीं हो..!!
तो उधर से दूसरा प्रश्न होगा - क्यों..??
तो फिर आपको reason बताना होगा..!!
फिर तो दूसरी तरफ से two liner प्रश्न (कब, कहाँ, क्यों, कैसे ??) का इतना अम्बार लग जाएगा कि आप सभी प्रश्नों के reply देने में असहज महसूस करोगे।
इसीलिये इन 100 प्रकार के प्रश्नों से बचने के लिए बोला जाता है कि मस्त हैं भाई।👍👍
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वैसे, एक तरह से देखा जाए तो ये सही भी है क्योंकि अपनी हर एक बात और ना ही हर एक समस्या हर किसी के साथ share नहीं करना चाहिए।
क्योंकि अगर आप ऐसा करते हो तो आपको ये लंबे समय तक याद नहीं रहेगा कि आपने अपनी समस्याएं किस-किस को बताईं थीं।
जबकि दूसरी तरफ वो याद रख लेंगें और फिर एक दिन आपकी ही बातें; आपको बताकर; आपको चौंका देंगें।
और बदले में आपके मुंह से बस यही निकलेगा कि ये बात तुम्हें कैसे मालूम..???
और फिर वो; आपकी इस बेवकूफी पर हल्का सा मुस्कुरा देंगें।😊😊
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ये Article आपको कैसा लगा, कृपया अपने comments के माध्यम से अवश्य बताइयेगा।
जय हिंद।
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इन्हें भी पढ़ें:-

Sunday, 5 March 2017

मेरे सुधरने से क्या; दुनियाँ सुधर जाएगी...!!

मेरे सुधरने से क्या; दुनियाँ सुधर जाएगी...!!

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दुनियाँ में करोड़ों लोग हैं तो करोंड़ों परेशानियां भी हैं और करोड़ो आश्चर्य भी।
इसीलिए आपको ये सुनकर आश्चर्य चकित नहीं होना चाहिए कि मेरी ये website (technic jagrukta) भी करोङों में हैं।
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खैर, इस post में; मेरा motive अपनी website को promote करना नहीं है।
बल्कि ऐसे लोगों के बारे में है जो दुनियाँ का उदाहरण देकर हमेशा गलत काम करते हैं..!!
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अभी कुछ दिन पहले 3-4 दोस्तों के साथ talkies में movie देखने गया।
अभी movie start ही हुई थी कि एक दोस्त का फोन ring करने लगा।
उसने call receive किया और बात करने लगा।
इससे आसपास बैठे तीन चार लोगों को बहुत disturb हो रहा था और बार-बार मुड़कर मेरे उस दोस्त को ऐसे घूर रहे थे जैसे कि किसी अनोखी चीज को घूरते हैं।
वैसे घूर तो मैं भी उसे रहा था लेकिन डाँटने को।😊😊
खैर, जैसे ही उसका कॉल cut हुआ तब उन लोगों ने चैन की साँस ली और शायद मैंने भी।
मैंने उसे उसी वक्त कुछ समझाना चाहा लेकिन talkies के बाहर समझाना ही उचित समझा।
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जैसे ही हम लोग talkies से बाहर निकले वैसे ही मुझे उस बात का ख्याल आ गया।
और मैं उसे समझाने लगा कि भाई सुधर जा सुधर..!!
talkies में call receive करना जरुरी था क्या...???
पता है कितने लोग disturb हो रहे थे?
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पता नहीं क्यों मेरी इस बात से वो थोड़ा नाराज हो गया और गुस्सैले भाव से बोला - मेरे सुधरने से क्या; दुनियाँ सुधर जाएगी।

Disturb हो रहे थे तो होने दो...!!! मैं अकेला ऐसा इंसान थोड़े ही हूँ जो talkies के अंदर बात करता हूँ।
और भी बहुत सारे लोग हैं जो बात करते हैं।
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खैर, उसके इस जवाब से थोड़ा मैं भी आहत हो गया और फिर मैंने उसकी इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया क्योंकि उस वक्त वो समझने के मूड़ में था ही नहीं।
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लेकिन पता नहीं क्यों रात को सोते समय वही बात mind में आ गई और सोचने लगा कि आखिर लोग ऐसा क्यों कहते हैं कि "मेरे सुधरने से क्या; दुनियाँ सुधर जाएगी।"
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अरे भाई हाँ सुधर जाएगी...!!!
क्योंकि ये दुनियां भी तो हम और तुम से ही मिलकर बनी है।
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चलो; एक बार मान भी लेते हैं कि नहीं सुधरेगी...!!
लेकिन दुनियाँ में सभी लोग तो बिगड़े हुए नहीं हैं कुछ तो सुधरे भी हैं...
तो आप उन सुधरने वालों को उदाहरण क्यों नहीं लेते हो..???
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खैर; हम हमेशा छोटी-छोटी बातों को ignore कर देते हैं...
जैसे कि-
👉talkies में movies देखते समय; call receive करना या दोस्तों से बातें करना
👉दीवारों पर पोस्टर चिपकाना
👉दीवारों पर warning लिखी होने के बावजूद भी पेशाब करना
👉public place पर गुटखा या तम्बाखू की पीच थूकना
👉ट्रेन में मूंगफली के छिलके फैलाना या सिगरेट पीना
👉traffic signal को तोड़ना.....आदि।
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ऐसी तमाम बातें हैं जिन्हें हम अक्सर ignore ही करते हैं।
ये सभी छोटी-छोटी बातें हो सकती हैं लेकिन इनके पीछे छुपी परेशानी कभी कभी बड़ा रूप धारण कर लेती हैं और फिर ये छोटी सी परेशानी ही तिल का ताड़ और राई का पहाड़ बन जाती हैं..!!!
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इसीलिए जब कभी भी कोई अच्छा कार्य करो तो इस ख्याल को बीच में कभी ना लाओ कि वो rules follow नहीं करते तो भला हम क्यों करें...???
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अरे भाई वो तो दुनियाँ के failures के उदाहरण लेते हैं जो सोचते हैं कि "मेरे सुधरने से क्या; दुनियाँ सुधर जाएगी।"
और यही सोचकर गलत काम करते रहते हैं...
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और वैसे भी किसी ने कहा भी है कि-
"आदमी तब बड़ा नहीं माना जाता जब वो बड़ी-बड़ी बातें करने लगे; आदमी तो तब बड़ा माना जाता है जब वो छोटी-छोटी बातें समझने लगे।"
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इसीलिए दोस्तों इन छोटी-छोटी बातों को ignore करना छोटे लोगों का काम है जबकि हम तो बड़े हैं...!!!
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अंत में कहना चाहूंगा कि-
हर एक काम को ऐसे करो कि वो एक निशानी बन जाए।
और निशानी ऐसी बनाओ कि वो आपके नाम से जानी जाए।।
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जय हिंद, जय भारत।
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इन्हें भी पढ़ें :-
1.विश्वास Vs अंधविश्वास
2.आखिर अपनी negative think को positive think में कैसे बदलें...???
3.पहचानें स्वयं की ताकत...!!!
4.जागरूकता एक ऐसा शब्द - जो हमें महान बनाता है।

Monday, 13 February 2017

इंसान का मशीनी दिमाग - कुछ भूला कुछ याद रहा

●आज के इंसान का मशीनी दिमाग ना जाने कितनी जगह spread होता है।
आज के इंसान का दिमाग 10 बातों को एक साथ लेकर चलता है और पूरे दिन इसी उधेड़बुन में लगा रहता है कि इन 10 कामों को; एक ही बार में; जल्दी से जल्दी किस तरह finish किया जाए।

वैसे आज के हिसाब से देखा जाए तो "एक तीर से दो निशाने" वाली कहावत वास्तविक सिद्ध नहीं होती।
क्योंकि आज हम सभी लोग एक तीर से दो नहीं बल्कि 10 के 10 निशाने लगाना चाहते हैं।
हम चाहते हैं कि कोई भी काम बस एक बार में हो जाए और फिर उसके बाद हम हो जाएं फ्री।
लेकिन तभी गहरी सोच में डूब जाते हैं कि आखिर ये होगा कैसे...???
और फिर सोचने में ही इतना time spend कर देते हैं जितना कि काम करने में नहीं लगता।
so that friends; किसी भी काम के बारे में सोचो कम और करो ज्यादा।
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●आज हम सभी जानते हैं कि google सभी समस्याओं का solution है।
जैसे कि :-
★किसी place की जानकारी चाहिए होती है तो गूगल;
★किसी व्यक्ति की जीवनी पढ़नी होती है तो गूगल;
★किसी चीज का full form चाहिए होता है तो गूगल...आदि।
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आज हम सभी लोगों ने अपना दिमाग चलाना ही बंद कर दिया है।
जैसे कि - किसी चीज का full form चाहिए होता है तो तुरंत google पर search करते हैं और full form मिलते ही वहां से quit कर जाते हैं ना कि उस full form को बार-बार rewind करके अपने mind में save करते हैं।
फिर कुछ दिनों या महीनों बाद उसी चीज का full form फिर चाहिए होता है तो दिमाग में ये आता जरूर है कि इसका full form मैंने पहले पढ़ा था लेकिन याद नहीं आ रहा; ये सोचते हुए अपनी उँगलियाँ automatic ही google पर typing करने लगती हैं।
और full form मिलते ही अनायास ही दिल से निकलता है; ओहो तो ये था!!! तबसे याद क्यों नहीं आ रहा था???
अरे!कैसे आएगा भाई!!!
आपने उस time; full form को सिर्फ देखा था; ना कि carefully पढ़ा था।
तो friends, इस तरह हम google पर कोई भी जानकारी सिर्फ सरसरी निगाहों से देखते ही हैं ना कि carefully पढ़ते हैं।
फिर जितनी बार उस चीज की जानकारी चाहिए होती है तो mind पर कम और google पर ज्यादा जोर देते हैं।
यही छोटे-छोटे लक्षण ही तो दर्शाते हैं कि हम अपने mind पर बिल्कुल भी जोर देना नहीं चाहते..!!!
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●पहले जब मोबाइल फ़ोन इतने ज्यादा spread नहीं थे तो हम सभी अपने relatives के मोबाइल नंबर भी जुबानी याद रख लेते थे।
लेकिन जब से smart phones ने सबकी pocket में अपना कब्जा किया है तब से हमें relatives के तो क्या? अपनी secondary sim के मोबाइल नंबर भी याद नहीं रहते!
क्योंकि अब किसी के मोबाइल नंबर याद करना हमें waste of time ही लगता है।
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देखा जाए तो ये बातें बहुत छोटी हैं लेकिन सोचा जाए तो बहुत बड़ी।
क्योंकि जब कभी अगर गलती हमारा मोबाइल गुम हो जाए तो सबसे पहली फिक्र हमें data और contacts की ही रहती है।
इसीलिए अंत में मैं इस article से सम्बंधित सिर्फ तीन बातें ही कहना चाहूंगा...!!!

👉1.अगर दो मिनट का काम हो तो दस मिनट सोचने में ना लगाएं मतलब सोचो कम और करो ज्यादा।
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👉2.google पर कोई भी चीज search करते वक्त उसे सिर्फ देखो मत बल्कि carefully पढ़ो।
मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि उसे तब तक rewind करो जब तक कि हमें ये ना लगने लगे कि अब तो ये lifetime के लिए हमारे mind में save हो गई हैं।
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👉3.हम पहले की तरह ही अपने सभी नहीं तो close relatives और friends के mobile number तो जुबानी याद रख ही लें ताकि मोबाइल गुम या कोई घटना हो जाने पर किसी के मोबाइल से भी तुरंत dial कर सकें।
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अगर आपको ये Article पसंद आया हो तो commentऔर share करना ना भूलें...!!!
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जय हिंद
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इन्हें भी पढ़ें :-
1.कहानी - नई सीख
2.कहानी - किसान पिता की दुविधा
3.The worship of God
4.inspire from 3 idiots movie

Sunday, 22 January 2017

एक माँ की परेशानी

कहानी :- जिसमें आप मिलेंगे खुद से...

एक माँ की परेशानी...

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सोनू महज 12 वर्ष का होगा ; वो खूब खाता पीता भी है और अपनी माँ की प्रत्येक बात को मानता भी है लेकिन जब उसकी माँ उसको रोज शाम को दूध से भरा गिलास देती हैं तो वह ऐसे मुँह बना लेता है जैसे कि माँ उसे दूध नहीं बल्कि कोई कड़वी दवा मिलाकर पिला रही हों।

खैर, सोनू सब जानता है कि दूध सेहत के लिए बहुत ही लाभदायक होता है लेकिन क्या करे...?? वह उसे अच्छा ही नहीं लगता।
कभी कभी तो वह माँ से दूध का गिलास लेकर साइड में रख देता है और माँ से बोल भी देता है कि अभी पी लूंगा; माँ जब-जब सोनू को इस तरह दूध देकर गईं थीं तब-तब सोनू ने उस दूध को कभी नहीं पिया।
वो सुबह तक बस यूँ ही रखा रहता जब तक कि उसकी मां उसे सुबह उठाने के लिए उसके रूम में नहीं जाती।
जैसे ही माँ दूध से भरा गिलास सुबह देखती तो थोड़ा खीझ उठतीं और उसे उठाते हुए कहतीं कि तुमने कल रात दूध क्यों नहीं पिया था..??
सोनू भी आँखे मलते हुए कोई बहाना खोज लेता और कहता ओहो माँ वो मैंने रात को पढ़ाई की थी ना सो याद नहीं रहा...sorry.
माँ उसकी sorry को सुनकर उसे माफ कर देती लेकिन मन ही मन सोचती कि पता नहीं कभी इसे दूध अच्छा लगेगा भी या नहीं लेकिन एक बात तो तय है कल से मैं इसके रूम में दूध रखूंगी नहीं बल्कि जब तक ये दूध पी नहीं लेता तब तक वहीँ बनी रहूंगी।
और इधर सोनू भी सोचता कि पता नहीं मुझे ये दूध कब अच्छा लगेगा..??
और फिर एक दिन ऐसा आ ही गया कि माँ और बेटे दोनों की ही मुराद पूरी हो गई।
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दरअसल सोनू को dance करना और cartoon देखने का बड़ा शौक है लेकिन अगर बात फिल्मी hero की की जाए तो उसे tiger shroff बहुत ही पसंद है।
सोनू अपने star tiger से मिलना चाहता था; लेकिन कैसे...???
आखिर उसे वो मौका मिल ही गया जब उसे पता चला कि अगले dance competition में tiger shroff guest हैं तो उसने भी अपनी माँ से dance competition में हिस्सा लेने की बात जाहिर की।
वैसे सोनू बहुत ही अच्छा dance करता था और regular ही practice भी किया करता था तो माँ की भी ना कहने की इच्छा नहीं हुई।
और दोनों पहुँच गए dance competition में।
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खैर; सोनू उस dance competition में कोई खाश performance तो नहीं कर पाया लेकिन आखिर में उसे अपने favorite star tiger से बात करने का मौका जरूर मिल गया।
उसने बस ऐसे ही tiger से उनकी सेहत का राज पूछा तो tiger ने भी normal तरीके से उसका जवाब दे दिया कि वो शाम को दूध और फल अवश्य खाते हैं।
फिर 2-4 नॉर्मल बातें करके सोनू और माँ अपने घर वापस आ गए।
माँ थोड़ी उदास थी क्योंकि उसका बेटा competition में नहीं जीत सका लेकिन सोनू बहुत खुश था क्योंकि वह तो बस अपने favorite star को देखना और उनसे बातें करना चाहता था।
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खैर, रोजाना की तरह माँ फिर से सोनू के लिए दूध का गिलास लेकर आई।
आज दूध से भरा गिलास देखकर ही सोनू का चेहरा खिल उठा लेकिन ये क्या पल भर में उतर भी गया।
उसने थोड़ा हैरानी के साथ माँ से कहा कि आज कुछ फल भी तो लेकर आतीं।
तो माँ ने भी हैरानी से कहा - क्यों मैं रोजाना सिर्फ दूध ही तो देती हूँ..!!
सोनू बोला :- अरे माँ आप शायद ध्यान भूल गईं कि tiger ने क्या कहा था..???
सोनू के मुंह से tiger का नाम सुनकर ही माँ को सब कुछ याद आ गया।
माँ :- लेकिन बेटे आज फल तो घर में हैं नहीं..!!!
सोनू :- अरे कोई बात नहीं माँ..!!! लेकिन कल से ध्यान रखना; और हाँ कल से दूध भी सिर्फ एक गिलास ही नहीं बल्कि दो गिलास देना..😊😊
ये सुनकर ही माँ को इतनी खुशी का एहसास हुआ कि मानो उसने बहुत बड़ा खजाना पा लिया हो।
माँ सोनू से प्यार भरी मुस्कान से बोली :- हाँ क्यों नहीं...अवश्य दूँगी।
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और फिर दूसरे दिन से ही माँ सोनू को एक नहीं बल्कि दो गिलास दूध और फल देने लगी और सोनू भी अब दूध को बोझ मानकर नहीं बल्कि tiger जैसा बनने के लिए पीता था😊😊😊
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तो friends ये तो रही सोनू और उसकी माँ की कहानी।
वैसे ऐसी ही हम सबकी कहानियां हैं।
हम भी किसी न किसी बात में अपने माँ-बाप या फिर किसी ऐसे करीबी व्यक्ति की बातों को ignore कर देते हैं; जो वाकई ही हमारे हित में होती हैं ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम उनकी बातों को बोझ समझते हैं।
जबकि वही बात हमारे किसी favorite star या फिर किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा बोली जाए जिसे हम अपना idol (आदर्श) मानते हैं तो उसी बात को हम ऐसे follow करते हैं जैसे कि हमारी जिंदगी में बस यही बात मायने रखती है।
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वैसे हमारे अंदर भी अच्छी बातों का असीमित भंडार भरा हुआ है लेकिन हम उसका उपयोग नहीं करते क्योंकि हम भी कहीं न कहीं सोनू की तरह अपने idol की बात मानने का इन्तजार करते हैं।
और idol भी वही सलाह देते हैं जो हम पहले से जानते हैं लेकिन मानते नहीं।
जरा सोचें...!!!
ऐसा क्यों...???
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इस article को लिखने का यही उद्देश्य है कि जरुरी नहीं कि हम हमेशा अपने idol द्वारा कही गई बातें ही मानें हम हमेशा वो ही बातें मानें जो वाकई ही सही है फिर चाहे वो बात हमारे idol द्वारा कही गई हो या फिर किसी अजनबी द्वारा...!!!
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So friends, इस ब्लॉग के thought आपको कैसे लगे कृपया comments के माध्यम से मुझे अवश्य बताइयेगा और हाँ जितना हो सके इस ब्लॉग को follow कीजियेगा।
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जय हिंद।
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इन्हें भी पढ़ें :-
01.किसान पिता की दुविधा
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02.माँ के लिए वास्तविक और दिखावटी प्रेम
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03.एक कदम आगे
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04.जरा सोचें...!!! क्यों हम अच्छी बातों को follow नहीं कर पाते..??

Thursday, 29 December 2016

जरा सोचें - एक अनकही कहानी

जरा सोचें - एक अनकही कहानी

अमन अपने कॉलेज में; final year में पढ़ता था।
और वो हमेशा की तरह आये दिन ही मस्ती करता रहता था।
कभी वो अपने junior की ragging करता तो कभी वो अपने कॉलेज की लड़कियों पर भद्दे comments करता।
तो कभी वो किसी लड़की को एकटक होकर घूरता ही रहता।
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खैर; अब उसके कॉलेज की लड़कियों को भी अमन का ये behaviour normal लगने लगा था।
लेकिन जब college में कोई नई लड़की आती तो उसे अमन का ये behaviour बड़ा ही अजीब लगता।
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उसके बारे में सब यही कहते कि ये कब सुधरेगा..??
कोई भला इंसान उसे समझाता भी; तो अमन और उसके दोस्त मिलकर; उसी का मजाक बना देते।
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उसके teachers भी उसकी इन हरकतों से परेशान थे, वो भी कहते कि इस लड़के का कुछ नहीं हो सकता..!!!
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खैर; समय का पहिया घूमते देर नहीं लगती।
ठीक एक बार फिर से समय का पहिया घूमा और अमन की वो loafer type life; change हो गयी।
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सबसे पहले अमन की family से मिलते हैं।

अमन अपनी family के साथ इंदौर में रहता है।और अमन की family में पांच लोग है।
अमन, अमन की माँ, पिता,और दो बहनें; जिनमें से एक की शादी हो चुकी है जो दिल्ली में रहती है जबकि दूसरी बहन उसी की हमउम्र ही है।
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अमन रोजाना की तरह थका हरा अपने college से घर पहुँचा।
घर पहुँचकर उसका चेहरा खिल गया था क्योंकि उसने खुशख़बरी ही कुछ ऐसी सुनी थी।
दरअसल अमन की बड़ी बहन को लड़की हुई थी।
जब उसकी मां और बहन ने अमन को ये खुशखबरी सुनाई तो वह खुशी के मारे उछल पड़ा।
क्योंकि अब उसकी भांजी दुनियां में आ चुकी थी और वह मामा बन चुका था।
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अब अमन को अपनी भांजी का चेहरा देखने की बहुत जल्दी थी।
तो अमन उसी दिन; इंदौर से दिल्ली जाने की जिद करने लगा।
उसकी माँ ने भी; उसे मना नहीं किया लेकिन उन्होंने भी शर्त रख दी कि छोटी बहन को भी साथ ले जाना पड़ेगा।
अमन इस बात पर राजी नहीं हो रहा था क्योंकि वो अकेला ही जाना चाहता था।
माँ के बार-बार बोलने पर उसने हाँ कर दी।
और वो दोनों शाम की train से दिल्ली के लिए रवाना हो गए।
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Train में बहुत भीड़ थी; जिस वजह से उन्हें सीट नहीं मिल पाई।
आगे के स्टेशन पर एक व्यक्ति उनकी birth से उतरा तो सीट पर एक व्यक्ति की जगह खाली हो गई थी जिस पर अमन ने अपनी बहन को बैठा दिया।
और खुद train में खड़ा रहा।
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अचानक अमन की निगाह एक लड़के पर गई जो उसकी बहन को घूर रहा था और वह लड़का ठीक उसी सीट के सामने बैठा था जिस पर अमन की बहन बैठी थी।
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2 मिनट बाद अमन ने फिर देखा लेकिन वह लड़का फिर भी अमन की बहन को घूरे जा रहा था; अमन को ऐसी गुस्सा आ रही थी कि वो उसकी आँखे नोंच ले।
लेकिन फिर भी उसने अपने गुस्से पर काबू किया।
अमन भी एक लड़का था इसलिए वो भाँप गया कि आगे चलकर ये लड़का कुछ ना कुछ हरकत जरूर करेगा।
इसलिए अमन की नजरें उस लड़के की प्रत्येक हरकतों की निगरानी करने लगी थीं।

और अमन ने जो सोचा वो सही निकला अब तो उस लड़के ने हद ही कर दी; ऊपर बैग रखने के बहाने खड़ा हुआ और अपना मोबाइल निकालकर अमन की बहन का फोटो ले लिया।
फोटो लेते समय वो भूल गया कि उसकी flashlight on थी।
अमन ने ये सब देख लिया और उसे पास बुलाते हुए बोला कि भाई फोटो अभी delete कर दे; ठीक रहेगा।
लेकिन वो समझ रहा था कि उसे फोटो लेते हुए किसी ने नहीं देखा तो वह अकड़ते हुए बोला :- फोटो...??? नहीं तो...!!! ये आप क्या बोल रहे हो..??
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अमन ने उसका मोबाइल छुड़ा लिया और फोटो delete करते हुए बोला कि ये क्या था...??
उस लड़के के पसीने छूट गए और माफ़ी मांगते हुए बोला कि गलती हो गई।
खैर; अमन ने उसे माफ़ कर दिया।
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अब वो लड़का अमन की बहन से तो दूर; खुद से नजर नहीं मिला पा रहा था।
वो उस डिब्बे से निकलने के बहाने खोजने लगा था क्योंकि अब वो समझ चुका था कि अब उसकी दाल नहीं गलने वाली।
जैसे ही अमन की नजर उस पर जाती ; उसका चेहरा शर्म से लाल हो जाता।
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खैर, अमन ने यहाँ तो एक भाई होने का फर्ज निभा दिया लेकिन फिर भी वो कहीं न कहीं खुद को guilty feel कर रहा था।
इसलिए नहीं कि उसने उस लड़के को फटकार लगाई; बल्कि इसलिए कि college में वो ऐसा खुद करता था।
अब अमन human behaviour को समझने लगा था; उसने जाना कि किस तरह लड़कियों के घर वाले उन्हें कॉलेज भेजते हैं और किस तरह हम जैसे loafer उनकी नजरें झुका देते हैं।
शायद हम जैसे loafer की वजह से ही कुछ लोग अपनी बेटियों को college में admission कराने से डरते हैं; वो डरते हैं कि हमारी बेटी college में पहुंचकर उन लोफरों का सामना कैसे करेगी..??
शायद हमारी वजह से ही कुछ काबिल लड़कियाँ कॉलेज में admission नहीं ले पातीं।
इन सबके दोषी हम जैसे लड़के ही हैं।
अमन को आत्मबोध हो चुका था और मन ही मन उसने अपना एक status सा बना डाला कि "अब मेरी नजरों की इतनी औकात नहीं कि कभी घूर सके किसी लड़की को; हमेशा याद रहेगा कि खुदा ने एक बहिन मुझे भी दी है।"
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और इस तरह अमन ने खुद की वो loafer type life change कर डाली।
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Friends, अक्सर ऐसा हम भी करते हैं ; जब हम घर से दूर जाते हैं तो अपनी family को भूल जाते हैं, और दूसरों की family हमें आवारा लगने लगती है फिर हम अपने दोस्तों के साथ मिलकर; किसी की भी बहिन, बेटी पर कुछ भी comments दे मारते हैं।
लेकिन जब खुद की बहिन की बारी आती है तो हम बौखला जाते हैं!!!
आखिर क्यों...???
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कुछ लोगों ने college का पर्याय ही मौज-मस्ती बना लिया है।
समझते हैं कि अब घरवालों ने उन्हें मौज-मस्ती का licence दे दिया हो।
खैर; मैं ये नहीं कहता कि college में आकर; मौज-मस्ती बिल्कुल भी ना करो।
अरे भाई करो; लेकिन उतनी ही; कि अगर किसी लड़की के घरवालों को पता भी चल जाए तो वो बौखला ना उठें।
बाकी तो आप खुद समझदार हो।☺
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ये article आपको कैसा लगा...??
कृपया अपने comments के माध्यम से अवश्य बताइयेगा।
जय हिंद।
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इन्हें भी पढ़ें :- 
1.माँ के लिए वास्तविक और दिखावटी प्रेम
2.एक किसान पिता की दुविधा
3.सफलता में बाधा :- ईर्ष्या
4.भगवान की आराधना

Friday, 4 November 2016

How to reduce traffic jam

अगर आप traffic jam से परेशान हैं तो अपनाएं यह तरीका


Traffic jam को कम करने का यह तरीका थोड़ा complicated है लेकिन effective है अगर नीचे दिए गए rules पर थोड़ा गौर किया जाए तो traffic काफी हद तक कम हो सकता है।
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●आज अपने भारत के सभी शहर यातायात अवरोध (traffic jam) की समस्या से जूझ रहे हैं फिर चाहे वो शहर मुम्बई हो या दिल्ली।
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इसीलिए आज इस topic पर बात करना बहुत आवश्यक हो गया है।
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यहाँ Traffic jam से जुड़े तथ्यों को सिर्फ 6 step में समझा जा सकता है और शायद उनसे छुटकारा भी पाया जा सकता है.!!
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☞Step 01. आखिर सड़कों पर traffic jam क्यों हो जाता है??
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☞Step 02. Traffic jam से अधिक परेशानी किन लोगों को होती है।
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☞Step 03. सड़कों पर हो रहे इस traffic jam का जिम्मेदार कौन है..??
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☞Step 04. Traffic jam को कैसे कम किया जा सकता है या इसको कम करने के क्या उपाय हैं??
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☞Step 05. Traffic jam को कम करने के लिए हमें किस वाहन का उपयोग करना चाहिए..??
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☞Step 06. आज traffic jam किन लोगों की बदौलत फिर भी कम है..??

अब इन सभी प्रश्नों के उत्तर हम one by one समझते हैं:-
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☞Step 01. आखिर सड़कों पर traffic jam क्यों हो जाता है??
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मुख्यतः सड़कों पर traffic jam होने का कारण; तेजी से बढ़ती जनसंख्या और वाहन ही हैं, अगर बात दिल्ली की; की जाए तो वहां metro चलने के बावजूद भी किसी और शहर से अधिक traffic है।
जहाँ मेट्रो किसी स्थान पर पहुंचने में 20 मिनट ही लेती है, वहीं बस 45 मिनट से कम नहीं लेती।
यह जो 25 मिनट का फासला है वो किसी speed वगैरह की वजह से नहीं बल्कि traffic के कारण ही है।
Traffic jam होने का कारण; सिर्फ बढ़ती हुई जनसंख्या ही नहीं है बल्कि वो लोग भी हैं जो कहीं अकेले जाते हैं और वो bus या auto से जाने की बजाय अपनी कार ले जाने का कदम उठाते हैं और फिर traffic jam हो जाता है।
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☞ Step 02. Traffic jam से अधिक परेशानी किन लोगों को होती है।
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वैसे traffic jam से परेशानी तो सभी लोगों को ही होती है लेकिन यहाँ सिर्फ परेशानी की नहीं बल्कि अधिक परेशानी की बात की जा रही है तो बता दूं कि Traffic jam से; अधिक परेशानी उन लोगों को होती है जिनके पास समय बहुत कम होता है और जाहिर सी बात है ऐसे लोग उच्चवर्गीय परिवारों से belong करते हैं।
इसीलिए traffic jam से अधिक परेशानी उच्चवर्गीय परिवार (अमीरों) को ही होती है।
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☞ Step 03. सड़कों पर हो रहे इस traffic jam का जिम्मेदार कौन है..??
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वे सभी लोग; जो कहीं अकेले जाते हैं तो bus या auto का use ना करके स्वयं की कार ले जाते हैं।
और traffic jam करवा देते हैं।
इसीलिए traffic jam के जिम्मेदार वो लोग हैं जो अकेले के लिए भी स्वयं की car लेकर निकल पड़ते हैं।
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☞ Step 04. Traffic jam को कैसे कम किया जा सकता है या इसको कम करने के क्या उपाय हैं??
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Traffic jam को कम करने का सबसे आसान जो उपाय है वो यह कि traffic rules को follow किया जाए।
अगर traffic rules को follow करने के बावजूद भी traffic jam कम होने में कोई बदलाव नहीं दिखता है तो ये एक serious problem है।
खैर, traffic jam को reduce करने का मैंने जो तरीका खोजा है शायद वो आप पहले से जानते हों लेकिन मानते ना हों।
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तरीका :- 
1. अकेले कहीं जाने के लिए कभी कार का उपयोग ना करें क्योंकि चार ऐसे लोग; जो खुद की कार लेकर सड़कों पर निकल पड़ते हैं फिर सडकों पर 4 कार दौड़ रहीं होती हैं और प्रत्येक कार में सिर्फ एक-एक व्यक्ति ही होता है जबकि वही चार लोग अगर अपनी-अपनी कार से जाने की बजाय एक auto से जाएँ तो सड़क पर एक कार की जगह एक auto लेगा और बाकी तीन कारों की जगह रिक्त हो जायेगी।
और इस तरह traffic jam तीन गुना तक कम हो जायेगा।
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2. आप कितने भी अमीर क्यों ना हों..??
अगर traffic jam कम कराने का हौंसला रखते हो तो जब कभी भी कहीं अकेले जाना हो तो कार (4-wheeler) का use ना करें बल्कि bus, auto या public transport का ही use करें।
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और हाँ; अगर आप auto का use करते हैं तो पैसे के दम पर कभी उसे अकेले के लिए book ना करें क्योंकि auto में चार लोगों के बैठने की पर्याप्त जगह होती है और ऐसे में अगर आप अकेले के लिए ऑटो book कर लेते हैं तो बाकी के तीन लोगों को दूसरी auto से जाना पड़ेगा और फिर वही traffic jam की समस्या आ खड़ी होगी।
आपको traffic को कम करवाना है ना कि auto book करके; comfort होकर traffic को बढ़ावा देना है।
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☞ Step 05. Traffic jam को कम करने के लिए हमें किस वाहन का उपयोग करना चाहिए..??
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कुछ उच्चवर्गीय लोग auto, bus या metro से जाने में अपनी तौहीन समझते हैं।
वो समझते हैं कि जब मेरे पास खुद का वाहन है तो bus वगैरह से क्यों जाएँ??
सही बात है; अगर आपको Traffic jam से कोई problem नहीं आती तो आप ख़ुशी-खुशी अपने वाहन से ही जा सकते हैं लेकिन अगर आपको traffic jam; एक serious problem लगती है और इससे मुक्ति पाना भी चाहते हैं तो आपको अकेले के लिए कार ना ले जाकर metro या bus से ही जाना होगा; बाकी reason तो आप जान ही चुके हैं कि क्यों जाना होगा..???
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☞ Step 06. आज traffic jam किन लोगों की बदौलत फिर भी कम है..??
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कुछ लोगों के पास समय बहुत कम होता है और traffic jam लगने पर बस या ऑटो वालों को दोषी ठहराते हैं; जबकि खुद car में अकेले बैठे रहते हैं और traffic jam का कारण बनते हैं।
अगर शहर में bus या auto चलाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाए तो प्रत्येक व्यक्ति स्वयं का वाहन खरीदने की जद्दोजहद में लग जाएगा।
फिर एक समय ऐसा आएगा कि सभी के पास वाहन तो पर्याप्त होंगे लेकिन उन्हें चलाने के लिए सड़कें नहीं होगीं।
इसीलिए आज ऑटो या बस चलाने वालों का शुक्रिया अदा करो क्योंकि इन लोगों के दम पर ही आज सड़कें फिर भी फ्री हैं वरना सड़कों पर traffic इतना अधिक हो जाता कि जो footpath; लोगों के पैदल चलने के लिए बनाये जाते हैं उन पर फिर बाइक या साईकल दौड़ने लगती और फिर सड़कों पर पैदल चलने के लिए तो क्या पैर रखने के लिए भी जगह नहीं मिलती।
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So friends, my humble request please follow these guidelines.
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और हाँ, शुरुआत भी खुद से ही करनी पड़ती है बाकी तो आप खुद ही समझदार हो।
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Thankyou
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तो friends ये थे traffic jam को समझने और उनसे उबरने के 6 Steps.
Traffic jam से मुक्ति पाने का ये तरीका आपको कैसा लगा; कृपया अपने comments के जरिये हमें बताइये ताकि हम ऐसे और भी article लिखने की कोशिश करें।
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जय हिंद।

Wednesday, 26 October 2016

माँ के लिए वास्तविक और दिखावटी प्रेम

माँ के लिए वास्तविक और दिखावटी प्रेम


कुछ वर्ष पहले बहुत खुश थी वो माँ; जो अपने बच्चों को लोरियां सुनाकर सुला देती थी।
बहुत खुश था वो बच्चा जिसे माँ की लोरियाँ किसी टॉफ़ी से अधिक प्यारी लगती थीं।
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समय गुजरता गया; बच्चा बड़ा होता गया और माँ की लोरियों की जगह television ने ले ली।
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अब वही बच्चा शाम को माँ की लोरियों की जगह; television पर cartoons को देखते-देखते सोने लगा।
अब शायद वो बच्चा माँ की वही लोरियाँ बार-बार सुनकर थक गया था; शायद इसीलिए उसने लोरियों की जगह cartoons को दे दी।
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खैर; समय और गुजरा; बच्चा और भी बड़ा होता गया और फिर television की जगह smartphone ने ले ली।
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अब वही बच्चा शाम को tv पर cartoons की जगह; पिता से मोबाइल लेकर games खेल-खेलकर सोने लगा।
अब शायद वो बच्चा tv पर cartoons देख-देखकर bore हो गया था ; शायद इसीलिए उसने cartoons की जगह games को दे दी।
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खैर; समय और गुजरा और वो बच्चा; अब बच्चा नहीं रहा बल्कि एक बालिग बन गया था और उसके पास खुद का एक smartphone आ गया था।
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फिर उस बच्चे का संपर्क games की दुनियाँ से भी टूटकर; internet से जुड़ा।
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और जब संपर्क internet से जुड़ गया है तो भला social media से कैसे अछूता रहा जा सकता है।
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Social media (facebook+whatsapp) पर उसने अपना account बना लिया और धीरे धीरे वो अपनी माँ से दूर होता गया और उसकी आँखे नए नए लोगों को ढूंढने लगीं।
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उसकी माँ बार-बार उसे खाना खाने के लिए कहती और वो; "बस माँ दो मिनट" कहकर आधा घंटा निकाल देता।
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जो माँ पहले लोरियाँ सुनाकर बहुत खुश होती थी; अब वही माँ ये सोचकर दुःख रहती है कि मेरा बेटा मोबाइल पर आखिर ऐसा क्या करता है जो उसे खाना खाने के लिए भी इन्तजार करना पड़ता है।
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माँ कभी-कभी उससे कहती भी थी कि कुछ और भी कर लिया कर, इस तरह मोबाइल का कीड़ा बनना अच्छी बात नहीं।
लेकिन उस पर माँ की बातों का असर होता ही नहीं था, वो माँ की बातों को एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देता था और फिर से अपने कामों (facebook और whatsapp) में busy हो जाता।
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वैसे real में वह माँ के लिए समय भले ही ना निकाल पा रहा हो लेकिन facebook और whatsapp पर माँ के लिए उतना ही बढ़ गया था।
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फिर वो social media पर regular ही माँ के ऊपर बनी post को पढ़ने लगा, like करने लगा और तो और; comments में i love my mom भी लिखने लगा था।
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सच कहें तो वो सिर्फ लिखता ही था, social मीडिया पर जितना प्यार वो माँ के लिए दिखा रहा था ना...!!
reality में अगर वो उसका 50% ही प्यार माँ को देता....तो उसकी माँ के लिए उसका बेटा "मोबाइल का कीड़ा" ना बनता।
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खैर; क्या आप जानते हैं कि ये किस लड़के की कहानी है।
ये किसी और लड़के की नहीं बल्कि मैं सोचता हूँ कि ये हमारी और तुम्हारी ही कहानी है।
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जो अपना अधिकतर समय facebook और whatsapp पर ही बिताते हैं और वहाँ माँ के ऊपर बनी post पर i love my mom का comment भी चिपका देते हैं।
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अरे भाई...facebook पर तो i love my Mom का वो भी comment कर देगा; जो घर पर अपनी माँ से प्यार ना करता हो।
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शायद आज हर माँ के लिए उसका बेटा मोबाइल का कीड़ा बन गया है।
इसीलिए मेरा मानना है कि मोबाइल चलाओ;  लेकिन उतना ही कि आप अपनी माँ की नजरों में उनके बेटे ही रह सको; ना कि एक मोबाइल के कीड़े😏😏..!!!
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So friends, मेरे कहने का मतलब यही है:_
"वास्तविक प्रेम वह नहीं है जो हम माँ के प्रति online (facebook+whatsapp पर) बयाँ करते हैं।"
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"वास्तविक प्रेम तो वो है जब हम offline; माँ के साथ बैठकर उन्हें अपना वास्तविक समय देते हैं।"
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इसलिए जब फुर्सत हुआ करे तब माँ के साथ बैठ लिया करो यारो..!!!
क्या पता कल को हमारे इस तरह online रहने से माँ हमसे रूठ जाये और हम facebook पर फिजूल ही दिखावटी प्रेम और i love my mom के comments करते रहें।
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इस blog में मैंने बहुत सारी कड़वी लेकिन सच्ची बातें लिखी हैं अगर फिर भी किसी की भावनाओं को हमारे शब्दों से चोट पहुँची हो तो मैं माफी मांगता हूं।
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कृपया अपने comments द्वारा बताइये कि ये blog आपको कैसा लगा..???
हो सकता है कि मैंने अपने blog में कुछ गलतियाँ की हों क्योंकि मैं अभी एक नया blogger हूँ।
इसीलिए आपका फर्ज बनता है कि उन गलतियों को अपने comments के जरिये बताएं।
और मुझे; और भी article लिखने के लिए प्रोत्साहित करें।
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जय हिंद।

Sunday, 16 October 2016

One step ahead

एक कदम आगे...

कौटिल्य को आज कौन नहीं जानता..???
एक ऐसा बच्चा जिसे आज देश-दुनियाँ के सभी नाम याद हैं और computer जैसा दिमाग है।
Atleast एक छोटा बच्चा और इतना active कैसे हो सकता है..??
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ये सवाल हर किसी के जेहन में आता है..??
और आना भी चाहिए क्योंकि ऐसा सुनना और देखना हमें असंभव सा लगता है; कुदरत का करिश्मा लगता है!!!
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Budhiya singh born to run : a movie
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अगर आपने ये movie नहीं देखी तो मैं कहना चाहूँगा कि पहले आप इस movie को देखिये और उसके बाद मेरा blog पढ़िए..!!! क्योंकि ये blog भी मैंने उसी movie से inspire होकर बनाया है।
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movie देखने or download करने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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इस movie के name पर मत जाइये क्योंकि ये movie इसके name से बहुत अच्छी है!!!
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ये बात मैंने इसलिए बोली क्योंकि अधिकतर लोग movie के name से ही decide कर लेते हैं कि कौन सी movie देखनी चाहिए और कौन सी नहीं..!!! जो कि सरासर गलत है।
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हम किसी भी movie को देखने से पहले; ये भी decide कर लेते हैं कि अगर movie किसी famous actor; like as - सलमान खान, शाहरुख़ खान की हुई तो अच्छी otherwise बेकार।
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कभी कभी famous actor के अभाव में हम एक बहुत ही अच्छी movie (story) देखने से वंचित रह जाते हैं...!!!
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यही वजह है कि हम बुधिया सिंह जैसी movies को ignore कर देते हैं क्योंकि इस movie का ना तो name ही कुछ खाश है और ना ही इसमें कोई खाश actor है।
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but i think; ये movie आपको देखनी चाहिए क्योंकि ये सिर्फ एक movie नहीं है बल्कि ये एक सच्ची घटना पर आधारित फिल्म है और इसमें किसी के talent को बड़ी ही अच्छी तरह से दिखाया गया है!!
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जी हाँ, एक बच्चे बुधिया सिंह का talent...!!!
बुधिया सिंह मात्र 5 वर्ष का है और वह बिना रुके, बिना पानी पिए 65km तक मैराथन कर लेता है...!!!
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अगर बुधिया सिंह का coach (मनोज वाजपेयी) उसे एक बच्चा समझकर दौड़ने के लिए मना कर देता तो हमें उसके talent का कभी पता ही नहीं चलता कि कोई बच्चा non-stop 65km तक भी दौड़ सकता है।
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खैर, ऐसे तमाम उदाहरण हैं जिनमें छोटे उस्तादों ने ही बड़ा काम कर दिखाया है और दुनियाँ में अपनी एक नई पहचान कायम की है।
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कभी-कभी हम बच्चों के बारे में कहते हैं कि अभी तो वो बहुत छोटा है, उम्र के साथ सब सीख जाएगा...!!
ठीक इसी जगह हम गलती कर बैठते हैं और बच्चों को बचपन में ही उनके talent से रूबरू नहीं करवाते..!!!
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अगर किसी बच्चे में बचपन से ही कुछ सीखने की ललक है तो उस ललक को हमें उस बच्चे की उम्र पर नहीं छोड़ देना चाहिए कि अभी तो बहुत time है सब सीख जाएगा बल्कि उसे उसी समय उसकी ताकत से रूबरू करवाना चाहिए, उसका हौंसला बढ़ाना चाहिए और छोटी उम्र में ही उसे बड़ा उस्ताद बना देना चाहिए..!!!
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बच्चा ही क्यों..???
अगर आप भी सोचते हैं कि अभी तो काफी समय पड़ा है फिर कर लेंगें..!!!
तो यही आपकी गलत सोच है; क्योंकि आज की प्रतियोगी दुनियाँ में समय ही तो नहीं है..!!!
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अगर आप सोचते हैं कि मैं तो अपनी उम्र के हिसाब से पर्याप्त जानता हूँ तो ये सोच भी ठीक नहीं है..!!
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क्योंकि ठीक ऐसा ही अगर असुरों के गुरू शुक्राचार्य भी सोच लेते तो शायद वो सिर्फ 6 वर्ष की उम्र में ही अपने गुरू से अधिक शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते।
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अगर एक छोटा बच्चा आपको कोई suggestion देता है तो आपको उसके suggestion को भी ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए क्योंकि हो सकता है कि उसे भी छोटी उम्र में ही शुक्राचार्य जितना ज्ञान प्राप्त हो गया हो..!!!
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friends, मेरे कहने का मतलब यही है कि अगर आप चाहते हैं कि आप अपनी छोटी उम्र में ही अपने senior को मात दे दें तो आपको उम्र का इंतजार नहीं करना चाहिए बल्कि जितना हो सके उतना सीखने की कोशिश करते रहना चाहिए;
क्योंकि...
"उम्र के साथ तो हर कोई सीखता है लेकिन जो उम्र से पहले सीखे वही महान होता है।"
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I think, इसका moral लिखने की मुझे जरुरत नहीं है क्योंकि आप समझ ही गए होंगे कि इस छोटे से blog में कितने moral छिपे हुए हैं...!!!
जरुरत है तो सिर्फ इन moral पर अमल करने की।
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अगर आपको यह post अच्छी लगी हो तो कृपया share या comment करना ना भूलें क्योंकि आपका एक comment हमें और भी blog लिखने के लिए प्रेरित करेगा।
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जय हिन्द।

Saturday, 8 October 2016

जरा सोचें...!!! क्यों हम अच्छी बातों को follow नहीं कर पाते..??

जरा सोचें...!!!

क्यों हम अच्छी बातों को follow नहीं कर पाते..??


story 01...
किसी एक बात पर ही अपना concentrate करें...

जिसने भी लिखा है...!!!
उसने क्या खूब लिखा है:-

         "रोज status बदलने से जिंदगी नहीं बदलती;                  जिन्दगी को बदलने के लिए सिर्फ एक status                    काफी है।"
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In fact, जब किसी बच्चे को उसका teacher ज्यादा homework (10 page) दे देता है तो फिर या तो वह बच्चा कम homework कर पाता है या फिर homework ही नहीं करता है।
अगर उसका teacher उसे कम homework (2-4 page) ही दे तो वह बच्चा उस homework को अच्छे से करता है और उस homework पर concentrate भी करता है।
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ठीक ऐसा ही हमारे साथ भी होता है जब इन्टरनेट पर उपस्थित सभी अच्छी post को हम पढ़ते जाते हैं; पढ़ते जाते हैं और जब follow करने की बारी आती है तब या तो हम उन post को कम follow करते हैं या फिर follow ही नहीं करते हैं।
अगर हम सिर्फ एक अच्छी post को पढ़ें और जिन्दगी भर उसे follow करें तब देखो सिर्फ वही post हमारी जिन्दगी बदल देगी।
क्योंकि फिर हम उस post को अच्छे से follow करते हैं और उस post पर अपना पूरा concentrate भी करते हैं।
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मेरा मतलब रोज अच्छी post पढ़ने से जिन्दगी change नहीं होगी; जिन्दगी change करने के लिए सिर्फ एक post को follow करना ही काफी है।

story 02...
एक motivational post की value...
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क्या आपने कभी सोचा है कि जो कोई भी motivational post या Blog लिखता है वो कितनी मेहनत, कितनी लगन से लिखता है...!!!
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अगर आप इस बात को feel करना चाहते हो तो किसी दिन कोई ऐसी post बनाकर देखो जिसे पढ़कर लोग उस post के बारे में सोचने को मजबूर हो जाएँ और आपको ऐसी post बनाने के लिए; दिल से thanks बोलें।
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अगर आप कोई ऐसी effective और heart touching post बनाओगे तो उसे बनाने में आपको 3-4 घंटे लग जायेंगे और जब उस post को आप prepare करके किसी को पढ़ाओगे तो वो सिर्फ 5 मिनट में पूरी पोस्ट पढ़कर इति श्री कर देगा।
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अगर पूरी post पढ़ने के बाद कहीं उस व्यक्ति ने आपकी post को बकवास बता दिया तब आपको feel होगा कि वाकई ही कोई blog या motivational post बनाना; कितना मुश्किल कार्य (hard work) है।
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इन्टरनेट से कोई भी एक motivational post choose करो।
और उसे सरसरी निगाहों से नहीं बल्कि दिल से पढो..!!!
जब आप उस post को पूरा पढ़ लो तब उसके बारे में सोचो...???
आपको सोचने पर पता चल जायेगा कि किस तरह लिखने वाले ने उसमें अपने सारे emotions, experiences और feelings को input किया है।
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लिखने वाला; अपनी पूरी ताकत सिर्फ इसी बात में झोंक देता है कि कहीं कोई व्यक्ति उसके blog का गलत मतलब ना निकाल ले, बकवास ना बता दे और उसके लिखे हुए शब्द किसी की भावनाओं को ठेस ना पहुंचा दे।
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इन्टरनेट पर उपस्थित हर एक blog अपने आप में special होता है, उस blog में लिखने वाले के सारे emotions और experiences include रहते हैं।
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अब पता चला कि वाकई ही एक अच्छी और effective post लिखना उतना आसान नहीं है जितना कि लोग समझते हैं।
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story 03...
इसलिए भी नहीं कर पाते हम अच्छी बातों को follow...
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मैंने कहीं पढ़ा था :-
               "लोगों पर सुविचारों का असर इसलिए भी नहीं होता क्योंकि लिखने और पढ़ने वाले दोनों यही समझते हैं कि यह दूसरों के लिए है।"
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अब सोचिये जिसने भी यह thought बनाया होगा उसने कितना सोच-समझकर बनाया होगा।
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लिखने वाला जब पूरा blog लिखकर हमें send करता है तो अच्छा लगने पर हम उसे follow नहीं करते हैं बल्कि उसे किसी दूसरे को share कर देते हैं और समझ लेते हैं कि इस blog को हमने follow कर लिया।
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क्या इसे follow करना कहेंगे..???
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नहीं; इसे सिर्फ खुद का और दूसरों का timepass करना कहेंगे...!!!
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यही कारण है कि हम अच्छी बातों को follow करने से वंचित रह जाते हैं।
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खैर, मैं आपको कोई प्रवचन नहीं दे रहा हूँ।
मैं वही बातें repeat कर रहा हूँ जो आप पहले से जानते हैं लेकिन मानते नहीं।
मैं सिर्फ इतना कहना चाह रहा हूँ कि जब भी social media पर आपको कोई post या blog अच्छा लगे तो उसे सिर्फ share मत कीजिये बल्कि उसे जितना हो सके अपनी life में follow करने की कोशिश करें।
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मेरे हिसाब से आप सिर्फ वही सुविचार लोगों को share कीजिये जिसे follow करने की आप हिम्मत रखते हों।
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अगर आप अपने किसी करीबी या दोस्त को ऐसा सुविचार share करते हो जो आप खुद follow नहीं करते तो बदले में वो आपसे बोल सकते हैं कि पहले खुद ही अच्छे बन जाओ; बाद में हमें बनाना।
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तो ऐसे बोलने वाले काम मत करो जिससे लोग आपकी टाँग खींचे। ;)
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i think, मेरे तीनों message आप लोगों तक पहुँच गये होंगे कि मैं क्या कहना चाहता हूँ।
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फिर भी इस blog के तीनों important points; repeat करना चाहूँगा।
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1.रोज अच्छी post पढ़ने से जिंदगी नहीं बदलती; जिन्दगी को बदलने के लिए सिर्फ एक अच्छी post ही काफी है।

2. एक अच्छी और motivational post लिखना भी एक बहुत बड़ी कला है।
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3. आप किसी भी सुविचार को पढ़ने के बाद ये ना समझें कि ये दूसरों के लिए है।
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आशा करता हूँ कि इस blog से आपको कुछ सीखने को मिला होगा।
बाकी इस लेख से अगर आपको कुछ शिकायत हो या कुछ कहना चाहते हो..!!
तो comments अवश्य करें।
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जय हिन्द।

इन्हें भी पढ़ें:-
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Wednesday, 5 October 2016

सफलता में बाधा - ईर्ष्या

सफलता में बाधा :- ईर्ष्या

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3 idiot का वह डायलॉग तो शायद आपको याद ही होगा।
जब फरहान और राजू ने human behaviour के बारे में जाना कि "जब दोस्त fail हो जाए तो दुःख होता है लेकिन जब दोस्त first आ जाये तो और ज्यादा दुःख होता है।"
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वैसे उन दोनों की सोच कुछ गलत नहीं थी उन्होंने वही सोचा जो हर कोई सोचता है।
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क्या आपने कभी सोचा है कि जब दोस्त fail हो जाए तो हमें दुःख क्यों होता है...???
हमें वो दुःख इसलिए होता है क्योंकि वो हमसे एक कदम पीछे और अकेला रह जाता है..!!
जिसे हम हमदर्दी भी बोल सकते हैं और इसी हमदर्दी के कारण; दोस्त के fail हो जाने पर; हमें दुःख होता है।
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अब सोचो कि जब दोस्त first आ जाए या top करे तो और ज्यादा दुःख क्यों होता है...???
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उसके top करने से वो हमसे 1-2 नहीं बल्कि 10 कदम आगे निकल जाता है और हम पीछे (अकेले) रह जाते हैं।
अब ये और ज्यादा दुःख किसी हमदर्दी के कारण नहीं बल्कि ईर्ष्या(jealousy) के कारण होता है।
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आइये; same यही formula हम 3 idiot पर apply करके देखते हैं...!!!

first attempt में जब फरहान और राजू ने देखा कि list में रेंचो का नाम नहीं है तो उन्हें दुःख हुआ क्योंकि रेंचो के प्रति उन्हें हमदर्दी थी।
लेकिन जब second attempt में देखा कि रेंचो तो first आया है तो उन्हें और ज्यादा दुःख हुआ।
अब यहाँ उनके और ज्यादा दुःख होने की वजह कोई हमदर्दी नहीं बल्कि ईर्ष्या/जलन ही थी।

अब वो तो सिर्फ एक movie थी।
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लेकिन अगर बात reality की; की जाए तो...!!!
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जैसा कि हम जानते हैं जो जलता है; वह फिर खाक भी होता है फिर चाहे वो कोई चीज हो अथवा इंसान।
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चीज खाक हो जाए तो दूसरी खरीदी जा सकती है; लेकिन इंसान नहीं।
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चीज को आग; खाक करती है जबकि इंसान को ईर्ष्या।
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जब तक हमारे अन्दर ईर्ष्या है हम सफल नहीं हो सकते।
यह ईर्ष्या ही हमारी सफलता में बाधा है।
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अब सवाल है कि आखिर यह ईर्ष्या होती क्यों है...???
इसके निम्न कारण हो सकते हैं :-
●आपका दोस्त हर बार exam में आपसे अधिक अंक लाता है।
●आपके दोस्त के पास; आपसे अच्छा mobile या कोई चीज है।
●आपका दोस्त आपसे smart है....आदि।

ईर्ष्या के चलते आप अपने दोस्त से कभी आगे नहीं निकल सकते क्योंकि जब तक आपके पास ईर्ष्या रहेगी आप खुद को अपने दोस्त से कमतर आँकोगे..!!!
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अगर आप चाहते हैं कि आप भी अपने दोस्त या किसी करीबी की तरह सफल हों तो आप उससे ईर्ष्या नहीं करें बल्कि प्रेरणा (inspiration) लें।
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आप ये जानने की कोशिश करें कि वो इतना सफल क्यों है...???
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जब आपको उनके सफल होने का कोई strong reason मिल जाए तो आप भी उसी दिशा में अपने कदम बढ़ाने की कोशिश करें।
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मान लीजिये आपके दोस्त के पास आज laptop है और आपके पास नहीं है तो इस स्थिति में आपको ईर्ष्या feel हो सकती है लेकिन आपको ये नहीं पता कि आपके दोस्त को भी आपसे ईर्ष्या होती है क्योंकि आप study में उससे बहुत अच्छे हो।
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आप उसके laptop को देखकर jealousy feel ना करें बल्कि अपने talent को देखकर खुद पर proud feel करें।
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ईर्ष्या से बचने का सबसे आसान उपाय यही है कि हम अपनी खाशियत/खूबियों को गिनें, स्वयं की ताकत पहिचानें और दूसरों से अपनी तुलना करने से बचें।
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इस तरह ईर्ष्या नामक बाधा को जड़ से मिटाकर हम अपने दोस्त की तरह दुनियां में अपनी पहिचान बना सकते हैं और सफल हो सकते हैं।
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जब आप सफल लोगों से ईर्ष्या करना छोड़ देते हैं और उनसे प्रेरणा लेना start कर देते हैं तभी से आप सफलता की सीढ़ी चढ़ने लगते हैं।
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इस blog को ऐसे ही ignore ना करें जितना हो सके इस पर अमल करने की कोशिश करें। दूसरों से ईर्ष्या करना छोड़ दें और उनसे प्रेरणा लेना सीखें।
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अगर यह blog आपको अच्छा लगा हो तो share और comment करना ना भूलें...!!!
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जय हिन्द।
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इन्हें भी पढ़ें :-
1.Traffic rules
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2.एक महान शब्द :- जागरुकता
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3.इसलिए हैं हम technology के गुलाम
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4.विजेता vs उपविजेता

Tuesday, 4 October 2016

The worship of God...

भगवान की आराधना
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आज की दुनियाँ में सभी अपनी मर्जी के मालिक है, सभी स्वतन्त्र हैं, जिसकी जो इच्छा होती है वो वही करता है।
यही वजह है कि कोई भगवान को मानता है तो कोई नहीं।

वैसे बचपन से मेरे परिवार वालों ने मुझे बताया कि भगवान होता है तो मैं भी भगवान की पूजा करने लगा।
कभी-कभी मैं अपने मार्ग से भटक जाता था और भगवान की पूजा नहीं करता था।
ऐसा इसलिए होता क्योंकि कभी-कभी मैं news में पढ़ लेता था कि एक family मंदिर; भगवान की पूजा करने जा रही थी और अचानक ही रास्ते में एक बस उन्हें ठोककर चली गई।
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ये सुनकर मेरा मन विचलित हो जाता था और फिर मैं भगवान की पूजा नहीं करता था इस पर घरवाले मुझे समझाते कि वो accident इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने कहीं ना कहीं गलती की होगी।
कैसे भी मेरी family मुझे समझा-बुझाकर भगवान की पूजा करने के लिए मना लेती थी।
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एक दिन फिर ऐसा आया कि मैंने भगवान की पूजा करना छोड़ दिया और फिर से मेरी family मुझे मनाने लगी लेकिन इस बार मैंने उनकी एक ना सुनी।
क्योंकि इस बार जो accident हुआ वो किसी और के साथ नहीं बल्कि मेरे साथ ही हुआ।
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हुआ यूँ कि हम कुछ दोस्त; एक बार नवरात्रि में माता जी के मन्दिर पर; अपनी साइड में; पैदल-पैदल जा रहे थे कि अचानक से पीछे से दो शराबी(जो bike पर थे) आये और मुझे पीछे से ठोकर मार दी जिससे मेरे पैरों में कुछ चोट आ गई थी।
अगर हम सभी दोस्त चाहते तो उनकी अच्छी तरह से मरम्मत भी कर सकते थे लेकिन वो इसलिए नहीं की क्योंकि हम सभी लोग शुभ कार्य करने मंदिर जा रहे थे।
और रास्ते में ये मारपीट करना हमें शोभा नहीं देता।
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खैर, जब वापस घर आये तो दर्द कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था और उस शराबी से ज्यादा मुझे भगवान पर गुस्सा आ रही थी।
क्योंकि मैं कोई disco में नाचने नहीं जा रहा था बल्कि अच्छे काम के लिए; माता के दर्शन करने जा रहा था।
फिर मैंने decide किया कि अब बहुत हुआ मैं अब भगवान की पूजा नहीं करूँगा।
इसीलिए मैंने फिर अपनी family की बातों को भी ignore कर दिया।
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आखिर 2-4 महीने भगवान से नाराज रहने के बाद घरवालों ने मुझे फिर से समझाया कि नास्तिक ना बनो भगवान की पूजा करना जरूरी है क्योंकि इससे हमें सद्बुद्धि मिलती है और हमारे साथ बुरा नहीं होता।
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घरवालों के इतना समझाने के बाद मैंने फिर से उनकी बात मान ली और शाम को regular भगवान की पूजा करने की आदत डाली ही थी कि फिर से एक और accident...
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इस accident ने अब मुझे पूरी तरह नास्तिक बना दिया था ऐसा नास्तिक कि मैं दूसरों को भी suggest करने लग गया कि वो भगवान की पूजा ना करें वरना उनका भी accident हो जायेगा।
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अब मैं जो लिखने जा रहा हूँ उसे पढ़कर या तो आप मुझे आप पागल बोल सकते हो या फिर मुझ पर हँस भी सकते हो क्योंकि मुझे अभी तक खुद पता नहीं चला कि मैं भगवान को मानता हूँ अथवा नहीं।
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वैसे सब कुछ भुलाकर; अगर आज की बात की जाए तो मैं फिर से भगवान की पूजा करने लगा हूँ और इसके लिए मुझे अब ना तो मेरी family ने force किया है और ना ही मेरे दोस्तों ने...!!!
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अब life में कुछ भी हो जाए मैं भगवान की पूजा करना नहीं छोडूंगा और ये मेरा अटल फैसला है।
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मैं भगवान की पूजा; ना तो दुनियाँ के डर से करता हूँ और ना ही भगवान से कुछ मन्नत माँगने के लिए।
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मैं भगवान की पूजा इसलिए करता हूँ ताकि मैं हमेशा ही बुरे कर्मों से दूर रह सकूं।
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एक पुजारी, जो दिन-रात मंदिर में भगवान की पूजा करता है वो कभी किसी के साथ गलत काम नहीं कर सकता क्योंकि गलत काम करने के लिए उसे time ही नहीं मिलता है।
और जब वो किसी के साथ गलत करता है तो उस वक्त वो भगवान की पूजा नहीं कर रहा होता है।
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दो दोस्त, रास्ते में एक-दूसरे से बुरे कर्म (गालियाँ) देते हुए जा रहे थे अचानक मंदिर मिलने पर वो गालियाँ छोड़कर भगवान के हाथ जोड़ने लगे और फिर मंदिर छोड़कर फिर से गालियाँ देने में व्यस्त हो गए।
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अब यहाँ notice करने वाली बात यह है कि जब तक उन्होंने भगवान के आगे हाथ जोड़े तब तक उनकी गालियाँ बंद थीं लेकिन जैसे ही मंदिर से बाहर निकले उनकी गालियाँ फिर से start हो गईं।
अगर वो पूरे दिन मंदिर में ही बैठे रहते तो शायद वो गालियाँ नहीं देते और बुरे कामों से दूर रहते।
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(ये blog आप technic jagrukta वेबसाइट पर पढ़ रहे हैं)
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हम सभी; बुरे कामों से बचने के लिए पुजारी की तरह सारे दिन तो भगवान की पूजा नहीं कर सकते लेकिन कुछ समय तो कर सकते हैं ताकि हम उस वक्त किसी से लड़ें नहीं, किसी से झगड़ें नहीं, किसी से गालियाँ ना दें और हर तरह के बुरे कामों से दूर रहें।
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ऐसा नहीं है कि हम भगवान की पूजा करते हैं तो भगवान हमारी मनोकामना पूरी कर देगा।
या फिर हमें accident से बचा लेगा।
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मनोकामना पूरी करने के लिए तो हमें कठोर परिश्रम ही करना होगा और accident से बचने के लिए हमें अपनी रास्ता सही से चलनी होगी।
बावजूद इसके अगर; accident होता है तो उसे सिर्फ एक इत्तेफाक समझ कर भूल जाना होगा।
उसके लिए भगवान को दोषी ठहराने से कुछ नहीं होगा क्योंकि accident का मतलब ही होता है कि अकस्मात् कोई घटना हो जाना तो उसमे भला भगवान क्या कर सकता है..???
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आप भगवान की कितनी ही पूजा क्यों ना करें आपको वो exam में भी तक pass नहीं करेगा जब तक कि आप मेहनत नहीं करोगे।
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हाँ इतना जरूर है कि भगवान की पूजा करते वक्त वो हमें बुरे कर्मों से दूर अवश्य रखता है।
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यही कारण है कि मैंने बुरे कामों से दूर रहने के लिए भगवान की पूजा करने का फैसला लिया है।
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अगर आप अभी भगवान की पूजा करते हैं तो ये अच्छी बात है लेकिन नहीं करते हैं तो आदत डाल लो क्योंकि बुरे कामों से दूर रहने का यह सही रास्ता है।
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अगर आप इस blog से सहमत या असहमत हैं तो हमें अपनी comments के जरिये अवश्य बताइए।
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जय हिन्द।
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इन्हें भी पढ़ें :-
1.आखिर अपनी negative think को positive think में कैसे बदलें...???
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2.आखिर कौन सा मोबाइल खरीदूं...??? Samsung vs china
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3.जागरूकता एक ऐसा शब्द - जो हमें महान बनाता है।
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4.हम और हमारे traffic rules

Thursday, 22 September 2016

.....फिर देखो दुनियां में इस तरह बन जायेगी आपकी भी पहिचान...!!!

फाइटर ब्रूसली का कथन तो शायद आपको याद ही होगा जब उन्होंने कहा था :-

"मैं उस व्यक्ति से नहीं डरता जिसने 10,000 kicks की practice सिर्फ एक बार की हो बल्कि उस व्यक्ति से डरता हूँ जिसने सिर्फ एक kick की practice 10,000 बार की हो।
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क्या अद्भुत, अतुलनीय और अविश्वशनीय बात कही थी उन्होंने...!!!
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क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी पहिचान किस रूप में की जाती है...???
जैसे कि सचिन तेंदुलकर की cricketer के रूप में, ब्रूसली की fighter के रूप में, लता मंगेशकर की एक singer के रूप में....आदि।
और आपकी....???

यदि आपको लगता है कि आपकी पहिचान भी एक विशेष रूप में की जाती है तो मेरी तरफ से आपको बहुत-बहुत बधाई...!!!
क्योंकि आपके उस field में सचिन, ब्रूसली और लता; आपको मात नहीं दे सकते।
क्योंकि ये तीनो सिर्फ आपको cricket, fighting और singing में ही मात दे सकते हैं।
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तो आप भी अपने आपको बहुत lucky मानो क्योंकि आप भी इन तीनों की तरह अपने आप में special हो।
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बस जरूरत है तो सिर्फ अपनी उस speciallity को जिन्दगी भर बनाये रखने की।
ठीक उसी तरह; जिस तरह इन तीनों ने भी अपनी जिंदगी cricket, fighting और singing में गुजार दी और दुनियां में अपनी एक नयी पहिचान कायम की।
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अब बात करते हैं उनकी जो यह समझते हैं कि उन्हें कुछ नहीं पता कि उनकी पहिचान किस रूप में कायम की जाती है।
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तो उनके लिए मैं सिर्फ यही कहना चाहूँगा कि उनकी पहिचान किसी भी रूप में कायम नहीं की जाती बल्कि कभी-कभी लोग उन्हें पहिचाने से भी मना कर देते हैं कि कौन हो तुम...??
अब यहाँ उनके दिल को थोड़ी चोट पहुँचती है और वो समझते हैं कि दुनियाँ में उनका कोई अस्तित्व ही नहीं है..!!
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इसी अस्तित्व के लिए दुनियां में उनको पहिचान बनाना बहुत जरूरी है।
और मैं आपको बता दूँ कि पहिचान बनाना उतना कठिन काम नहीं है जितना कि आप समझ रहे हैं!!
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अगर आपको पहिचान बनानी है तो सबसे पहले दुनियां वालों को ignore करना पड़ेगा।
आप जानबूझकर ऐसा काम करो जिसे देखकर लोग आप पर हँसे।
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इससे होगा ये कि जब कभी भी आपसे कोई गलत काम होगा तो लोग आप पर हसेंगे तो उनकी हंसी फिर आपको बुरी नहीं लगेगी बल्कि आप ये सोचकर दिल को तसल्ली दोगे कि इन पागलों का काम ही है हँसना।
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पहिचान बनाने के लिए आप निम्नलिखित कार्य भी कर सकते हैं...!!
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आप अपने college में सिर्फ एक दिन बालों पर साबुन लगाकर और उन्हें ऊपर की ओर खड़ा करके जाएँ।
जैसा कि आप जानते हैं कि ये देखकर सब लोग आप पर हसेंगे लेकिन वही लोग आपको हमेशा के लिए याद भी रखेंगे।
क्योंकि जब कभी भी आपकी बात आयेगी और जो लोग आपका नाम नहीं जानते वो भी कहेंगे कि वही लड़का जो एक दिन college में बालों पर साबुन लगाकर आया था।
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तो यहाँ पर भी आपकी पहिचान "बालों पर साबुन लगाकर आने" के रूप में हो रही है।
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खैर, इस तरह पहिचान बनाना आपको बेवकूफी लग रही है तो छोड़िये।
आप दूसरा और अच्छा काम कीजिये...!!!
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कोई भी एक अच्छा कार्य चुनिए जो आपको पसंद है।
अब आपको कौन सा काम पसंद है ये भी नहीं सूझ रहा तो मेरी पसंद का कर सकते हैं...!!!
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जैसे कि आप जब भी अपने हाथ में bike लें तो helmet अवश्य लगाइए।
फिर भले ही हम bike पे थोड़ी दूर पर ही क्यों ना जा रहे हों।
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अगर आप सोच रहें हैं कि ऐसा हम कुछ दिनों या महीनों तक कर सकते हैं
तो यहाँ कुछ दिनों या महीनों से कुछ नहीं होने वाला।
क्योंकि अगर आपको पहिचान बनानी है तो ऐसा कई सालों तक करना होगा।
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फिर देखिए आपकी पहिचान एक नए रूप में कायम होगी।
जब लोग helmet सम्बन्धी बात करेंगे तो आपका नाम सबसे पहले होगा और लोग कहेंगे कि मैंने एक ऐसे व्यक्ति को देखा है जो bike पर हमेशा ही helmet लगाकर चलता है।
और वो व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि आप ही होंगे।
तो यहाँ भी आपकी पहिचान एक "हेलमेटधारी" के रूप में हो रही है।
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helmet तो सिर्फ एक उदहारण है।
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आप कोई भी ऐसा काम करिए जो लगातार आप कई सालों तक कर सकते हैं तो वही काम आपकी पहिचान के रूप में उभरेगा।
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आप 100 अच्छे काम भले ही मत सीखो लेकिन एक अच्छा काम जिंदगी भर निभाओ।
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फिर देखो कि आपकी पहिचान कैसे नहीं बनती।
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so friends, आप अपनी पहिचान आज से ही बनाना start कर दो क्योंकि दुनियां उन्हीं लोगों को याद रखती है जो जिंदगी में कुछ special करते हैं, कुछ achieve करते हैं और कुछ unique करते हैं।
आप special हो, आपका काम भी special है कृपया इस बात को हमेशा याद रखें कभी भूलें नहीं।

फिर देखो दुनियां में इस तरह बन जायेगी आपकी भी पहिचान...!!!

जय हिन्द।

Sunday, 11 September 2016

Do you know about your power

पहचानें स्वयं की ताकत...!!!

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facebook और whatsapp के इस युग में आज आप free हो या busy ये आप खुद नहीं जानते।
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ओहो.....ये क्या बोल रहा हूँ मैं...???
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Sorry....sorry....sorry...!!!
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But i think मुझे sorry नहीं बोलना चाहिए...!!
पता है क्यों..???
क्योंकि मैंने जो ऊपर लिखा वह एक कड़वा सत्य है; जिसे आपको स्वीकार करना ही होगा!!!
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क्या आप बता सकते हैं कि अभी आप facebook और whatsapp पर मेरा यह blog पढ़ते वक्त busy हो या free.
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तो still आपका जवाब हो सकता है free.
क्योंकि मेरे ब्लॉग में अभी आपको attractive करने की power नहीं है, अगर किसी का अभी whatsapp पर message आ जाये तो आप इस blog को अधूरा छोड़ उसका message पढ़ने लगोगे।
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लेकिन अगर आपको मेरा यह blog बहुत अच्छा लग रहा है और सोच रहे हो कि इसे पूरा पढ़कर ही छोड़ेंगे तभी...
ठीक उसी वक्त आपकी mom; आपको आवाज लगाती हैं।
और अनायास ही आपके मुँह से निकलता है - बस mom दो minute.
तो आप यहाँ दो मिनट के लिए मेरा ब्लॉग पढ़ने में busy हो जाते हो...???
मतलब आपकी mom दो मिनट के लिए आपका wait करेंगी...???
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खैर, दो मिनट के लिए आप अपनी mom को wait करने दो क्योंकि अभी आप whatsapp पर किसी से फालतू की chat or jokes नहीं पढ़ रहे हो बल्कि एक बहुत ही अच्छा blog पढ़ रहे हो।
जिसका title ही है :- "पहचानें स्वयं की ताकत"
so that अभी mom की बात उतनी importance नहीं होगी जितना कि खुद की ताकत पहिचानने की।
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अब अहसास हुआ कि आपको खुद नहीं पता कि आप किस वक्त इस facebook और whatsapp पर busy हो जाओ और किस वक्त free.
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अब जब आपको अपने बारे में यही नहीं पता कि आप इस वक्त busy हो या free.
तब ताकत पहिचानना तो बहुत बड़ी बात है...!!!
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खैर, चिंता की कोई बात नहीं...!!!
आज हम आपको, आपकी ताकत से रूबरू करवाते हैं...!!!
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क्या आपको पता है कि इंसान के आगे बढ़ने या पीछे रहने के सिर्फ तीन reason हैं :-
1.Attraction
2.Addiction
3.Interested
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सबसे पहले हम इनको परिभाषित रूप में समझते हैं।
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1.Attraction :- attraction मतलब आकर्षित होना; इंसान को पीछे धकेलने में attraction की  महत्वपूर्ण भूमिका रही है; जो attraction को follow करता है वह अपने दिल को कभी follow नहीं कर पाता; यही वजह है कि वह अपनी ताकत को नहीं पहिचान पाता क्योंकि ताकत को पहिचानने के लिए आत्मसात् यानी कि दिल से सोचना बहुत जरूरी है।
Attraction की वजह से ही आज सब doctor, engineer post के पीछे भाग रहे हैं इसीलिए तो आज engineer की value बहुत कम है क्योंकि आज सभी engineering कर रहे हैं यहाँ तक कि वो भी जिसे engineering की spellings भी ठीक से नहीं आती।
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2.:- Addiction मतलब बुरी लत लग जाना; बुरी लत यानी कि शराब, सिगरेट, तम्बाकू यहाँ तक कि अब facebook और whatsapp भी Addiction category में आ गए हैं।
जो लोग Addiction के शिकार हो जाते हैं; वो सिर्फ Addiction को ही अपना career समझने लगते हैं और मुख्य लक्ष्य से भटक जाते हैं।
फिर जो लक्ष्य से भटका हो वो भला अपनी ताकत कैसे पहिचान पायेगा।
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3.Interested :- interested मतलब रूचि होना; जिसने अपने interest को follow किया है वह हमेशा ही आगे रहा है लेकिन interest को follow करने वाले लोग बहुत ही कम हैं क्योंकि interest को follow करने के लिए family support बहुत ही जरूरी है जो कि हर व्यक्ति के पास नहीं होता इसलिए family support ना होने की वजह से या तो वो attraction की तरफ भाग जाते हैं या फिर addiction के शिकार हो जाते हैं।
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मतलब अगर हमें सफल होना है तो Attraction or addiction (facebook+whatsapp) इन दोनों points को ignore करना होगा और हमें सिर्फ अपने दिल(interest) की ही सुननी होगी।
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अभी आपका लक्ष्य कुछ भी हो; उसे दो मिनट के लिए ignore करके जरा सोचो...!!!
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आप अपने circle (family+friends) में कुछ ऐसा काम कर सकते हो; जिसे आपसे बेहतर कोई और ना कर सके...???
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सोचो...???
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सोचो...???
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सोचो...???
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यदि हाँ; तो वही आपकी ताकत है।
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और यदि आपको लगता है कि आप ऐसा कोई भी काम नहीं जानते जिसे अपने circle में सबसे बेहतर कर सको।
तो यहाँ सोचने वाली बात है कि आपने अभी तक अपने अन्दर छुपे unique talent को पहिचाना नहीं है।
हर व्यक्ति अपने आप में unique है।
अब एक बार (जब आप अकेले हों) फिर से सोचना और हाँ सोचते वक्त इस mobile को किनारे रख देना क्योंकि कुछ भी सोचने में ये mobile बहुत बड़ी बाधा है।
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मैं वादा करता हूँ रात भर सोचने से आप अपने unique talent (अपनी ताकत) को पहिचान लेंगे।
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अब जब आपने अपनी ताकत को पहिचान लिया है तो सब कुछ छोड़कर आप अपनी उस ताकत को और strong बनाओ।
इतनी strong कि आप उसमें महारथ हासिल कर सको।
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for ex (जैसे कि) :- मेरी ताकत मेरे blog हैं मुझे लगता है कि मेरे circle में शायद ही कोई ऐसा हो जो मेरे से अच्छा blog लिख पाए।
इसीलिए technic jagrukta पर continuous post (blog) डालकर मैं अपनी ताकत को और strong कर रहा हूँ। और मुझे पूरा confidance है कि मैं धीरे धीरे ही सही लेकिन continuous blog लिखकर इसमें महारथ हासिल कर ही लूँगा।
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5 मिनट का यह blog बनाने में मुझे 3 घंटे लग गए अगर आप अपनी ताकत पहिचान कर उसे follow करते हैं तो समझूंगा कि मेरे 3 घंटे बेकार नहीं गए।
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अगर आपको मेरा आज का यह blog अच्छा लगा तो Technic jagrukta को regular visit करते रहिये, हम आपके साथ हैं।
और हाँ...
आपके मन में उठ रही किसी भी comments को ignore ना कीजिये।
so that please post a comment....
जय हिन्द।
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इन्हें भी पढ़ें :- 01.जरा सोचें...!!! क्यों हम अच्छी बातों को follow नहीं कर पाते..??
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02.सफलता में बाधा :- ईर्ष्या
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03.जरा सोचें - एक अनकही कहानी

Friday, 9 September 2016

How to change our negative think into the positive think

आखिर अपनी negative think को positive think में कैसे बदलें...???

कैसा हो..!!! अगर हम बुरी बातों में से भी अच्छाई को ढूंढ़ निकालें..!!!
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अगर बुरी बातों में से भी अच्छी बातें निकालने का माद्दा हमने पैदा कर लिया तो सोचो जिन्दगी कितनी खुशनुमा बन जाएगी..!!! है ना।
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चलो आज हम इसी topic को लेकर बात करते हैं कि आखिर बुरी बातों में से अच्छी बातें किस तरह निकालें और क्या सोचकर निकालें..???
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हम कुछ भी काम करते हैं तो लोगों के दो तरह के ही feedback होते हैं :-
1.negative
2.positive
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जो लोग आपके काम के लिए आपको positive feedback देते हैं, तो आप उन लोगों का welcome कीजिये क्योंकि वो आपके काम के प्रति आपका confidance बढ़ाते हैं।
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और जो लोग आपके काम के प्रति हमेशा ही negative feedback देते हैं तो ऐसे लोगों से आपका confidance थोड़ा loose हो जाता है और आप अपने काम के प्रति थोड़ा लापरवाह हो जाते हैं।
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ऐसा ही एक बार मेरे साथ भी हुआ।।।.
मैं regular newspaper और internet पर upload हुए good article को पढ़ा करता था लेकिन कभी उन article को follow नहीं करता था क्योंकि मैं सोचता था कि ये article follow करने के लिए नहीं बल्कि किसी और को story के तौर पर सुनाने के लिए होते हैं।
आज मुझे अफ़सोस होता है कि कितना गलत था मैं..!!!
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जिस दिन मुझे अहसास हुआ तो मैंने भी अपने मन में ठान लिया कि आज से जिन article को मैं पढूँगा उन्हें जितना हो सकता है follow करने की कोशिश करूँगा...!!!
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एक दिन मैंने helmet सम्बन्धी article को पढ़ा और decide किया कि आज से मैं हमेशा ही helmet लगा कर चलूँगा।
और चलता भी हूँ।
लेकिन फिर वही; मेरे इस काम के लिए मुझे negative और positive feedback मिलने लगे।
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कोई कहता कि थोड़ी दूर के लिए क्या helmet लगाकर जाते हो..!!! पागल हो क्या...???
तो कोई कहता कि अरे वाह...!!! बड़े क़ानून का पालन करने वाले बन गए हो, जैसे तुम्हारे लगाने से ही सब लोग हेलमेट लगाने लगेगें।
तो कोई कहता कि क्या तुम्हें helmet लगाना कुछ अजीब नहीं लगता.....वगैरह वगैरह।
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ये ऐसे लोग होते हैं जो खुद तो helmet लगाते नहीं और जो लगाते हैं उनके अन्दर भी ऐसी negativity भर देते हैं कि शायद वो भी helmet लगाना छोड़ दें।
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एक दिन मैं और मेरे 3 दोस्त अपनी-अपनी दो bike पर सवार होकर कहीं जा रहे थे।
(मेरे पास helmet था और मैं helmet लगाये हुए था दूसरी bike पर भी मेरे दोस्त के पास helmet था लेकिन उसने पीछे बैठे दूसरे दोस्त को पकड़ा रखा था। शायद वो सिर्फ police से बचने के लिए helmet use करते थे।)
तभी अचानक रास्ते में एक दोस्त को प्यास लगी और हम रुक गए, पानी पीकर हम फिर से चलने लगे लेकिन पता नहीं क्यों अचानक मेरे सिर में खुजली (itchy) होने लगी तो मैंने भी helmet को पीछे बैठे हुए अपने दोस्त को पकड़ने को कहा।
उसे पता था कि मैं हमेशा helmet लगाकर चलता हूँ तो वो बोला कि नहीं भाई helmet लगाओ..!!!
तुम तो कानून का पालन करने वाले हो ना..!!!
तो आज कैसे बिना helmet के bike चलाने की सोच रहे हो?
मैंने कहा कि यार आज सिर में खुजली हो रही है पकड़ ले ना please.
लेकिन उसने मेरी एक ना मानी और बोला कि सिर खुजलाकर फिर से लगा लो।
गुस्सा तो बहुत आया लेकिन मरता क्या ना करता वाली बात थी।
मैंने सिर खुजलाकर वापस helmet लगा लिया और फिर सोचने लगा कि ये कैसी मुसीबत को follow कर रहा हूँ मैं।
जब helmet लगाने की इच्छा ना हो तब भी मेरे कमीने दोस्त मेरे सिर पर रख ही देते हैं। और वो भी वह दोस्त जो खुद तो helmet लगाते नहीं पर मुझे जरूर लगवाते हैं।
ये सोचकर ही मेरा गुस्सा एकदम शांत हो गया क्योंकि अपनी इच्छा से तो सभी helmet लगाते हैं लेकिन जब इच्छा ना भी हो तब helmet लगाओ तभी सही मायने में कानून का पालन करना माना जाता है। जो मेरे प्यारे दोस्तों ने जाने अनजाने में मुझे सिखाया है, मैं उनका हमेशा आभारी रहूँगा क्योंकि उन्होंने जाने-अनजाने में ही सही लेकिन उन्होंने मुझे एक बहुत ही अच्छी सीख दी है जिसे मैं कभी नहीं भूलूंगा।
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इसलिए दोस्तों जितना हो सके आप अच्छी बातों का पालन करो फिर आगे चलकर आप अच्छी बातों का पालन करना नहीं भी चाहोगे तो आपके दोस्त और रिश्तेदार आपसे करवाएंगे तो आप उनकी comments को negativity के तौर पर नहीं positive सोचकर ग्रहण करो तभी सच्चे मायने में आप अच्छी बातों का अनुसरण कर पाओगे।
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helmet सम्बन्धी वो article मुझे इतना पसंद आया कि उसके ऊपर मैंने भी एक blog लिख डाला; जो शायद आपने पढ़ा हो अगर नहीं पढ़ा तो...
also read>>>  हम और हमारे traffic rules
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अब ये आपके ऊपर depend करता है कि आप इस blog को सिर्फ एक story समझकर ignore करते हो या फिर इसमें से helmet लगाने जैसी positive बातें निकालकर follow(अनुसरण) करते हो।
जय हिन्द।

Monday, 29 August 2016

Faith Vs superstition

विश्वास Vs अंधविश्वास

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मत कर यकीन उन फिजूल अंधविश्वासों पर;
क्योंकि उनसे इंसान सिर्फ खोखला होता है।
यकीन करना ही है तो करो अपने कर्मो पर;
क्योंकि अच्छे कर्मों से ही इंसान महान बनता है।।
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ब्रह्मांड में किसी भी चीज की कल्पना प्रायः हम उसके नाम के आधार पर कर लेते हैं फिर हमारे द्वारा की गई कल्पना से अगर उस वस्तु का मेल होता है तो वह कल्पना फिर यकीन में बदलने लगती है।
लेकिन महान तो वह लोग होते हैं जो किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान का मेल उसके नाम से नहीं बल्कि उसके काम और व्यवहार से करते हैं हालांकि किसी का नाम सुनकर काम और व्यवहार की कल्पना तो इन महान लोगों ने भी की थी लेकिन उनके द्वारा की गई वह कल्पना कहीं ना कहीं गलत साबित हो गई और इनके महान होने का का कारण भी वह गलत ही था; क्योंकि बिना गलती किए कोई भी व्यक्ति महान नहीं बनता।
अतः इस से यह तो स्पष्ट है कि किसी व्यक्ति वस्तु या स्थान की कल्पना उसके नाम के आधार पर नहीं करनी चाहिए फिर चाहे वह कल्पना सही निकले या गलत।
खैर; जैसा की हम जानते हैं कि विश्वास और अंधविश्वास में काफी अंतर है।
विश्वास :-किसी के कहने पर कम लेकिन स्वयं के द्वारा उसके साथ बरतने पर किया जाए तो सही मायने में वही विश्वास है और इस विश्वास में बहुतर सच्चाई ही होती है।
इसके उलट;
अंधविश्वास :- किसी के कहने मात्र से ही हम किसी व्यक्ति या वस्तु पर विश्वास कर लें फिर भले ही हम उसके साथ ना बरतें हों और ना ही उसका कोई अनुभव या स्वभाव का पता हो; तो यही अंधविश्वास कहलाता है और अंधविश्वास में बहुतर भ्रम ही होता है।
अभी पिछले महीने की ही तो बात है जब मैं जल्दी जल्दी में घर से कहीं जा रहा था कि अचानक एक बिल्ली मेरा रास्ता काट गई हर बार की तरह मैंने इस अंधविश्वास को नहीं माना और बिना रुके ही अपने रास्ते पर चल दिया और आगे चलकर अपशकुनानुसार मेरे साथ हादसा (accident जैसा) हो गया।
हालाँकि हादसा तो कुछ बड़ा नहीं था लेकिन कहीं ना कहीं मैं इस अंधविश्वास में यकीन जरूर करने लगा था मैंने जब यह बात कुछ लोगों से share की तो कहीं ना कहीं वह भी इस अंधविश्वास में पूर्ण यकीन करने लगे थे।
मैंने उन लोगों के अंधविश्वास को बढ़ावा देकर शायद बहुत बड़ी गलती कर दी थी क्योंकि मैंने उन्हें यह यकीन दिलाया था कि आप ने जो (पूर्वजों से बिल्ली के रास्ता काटने के बारे में) सुना था वह सही था।
अब यहां मैंने भी अपनी कल्पना को यकीन का दर्जा दे दिया था जो शत-प्रतिशत गलत था; क्योंकि मैं भी उन लोगों की मंडली में शामिल हो गया था जो अंधविश्वास में यकीन रखते थे।
इस बात का एहसास मुझे तब हुआ जब Bike से मेरे एक दोस्त के साथ भी accident जैसा हादसा हो गया जब मुझे उसके accident का पता चला तो बहुत दुख हुआ।
मैं उस दुख में डूबा हुआ ही था कि अगले पल मुझे ख्याल आया कि ऐसा हादसा तो पिछली बार मेरे साथ भी हुआ था; कहीं इसका रास्ता भी तो बिल्ली ने.....!!!
में मैं दौड़ा-दौड़ा उसके पास गया; देखा तो उसके हाथ पैर में चोट आई थी; फिर मैंने अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए उसे पूछ ही डाला कि भाई कहीं तेरा रास्ता भी तो बिल्ली ने नहीं काटा।
वह बोला - नहीं तो..!!!
 मैं - तो फिर यह एक्सीडेंट कैसे हुआ..???
वह - क्या बताऊं यार!!! मैं जल्दी-जल्दी में था और मेरी bike भी speed में थी; इसलिए वो जल्दी-जल्दी में एक्सीडेंट हो गया।
फिर वह पूछने लगा कि तुम ये बिल्ली की क्या बात कर रहे थे..???
तो मैंने अपनी पूरी आप बीती सुना डाली।
जब उसने सुना कि मैं भी उस समय जल्दी में था तो वह हल्की सी मुस्कुराहट के साथ बोला कि भाई वह तुम्हारा accident किसी बिल्ली इल्ली की वजह से नहीं बल्कि मेरी तरह जल्दी-जल्दी में और स्पीड से बाइक चलाने की वजह से हुआ था।
वाकई ही मेरे को उसकी बात में दम लगा और फिर मैंने सिर्फ उसी अंधविश्वास को ही नहीं बल्कि ऐसे बहुत सारे अंधविश्वास थे; सभी को मानना छोड़ दिया।
जैसे कि छींक पर घर से बाहर ना निकलना; गले में बाबा जी का ताबीज धारण करना; विभूति खाना आदि सभी को मानना छोड़ दिया क्योंकि यह सभी अंधविश्वास सिर्फ तभी काम करते थे जब देश में जादुई परियां होती थीं, जिन्न और भूत होते थे और हर व्यक्ति के पास असीम शक्ति होती थी।
अब जबकि ऐसा कुछ नहीं है तो भला ये अंधविश्वास क्यों...???
जो आपके और आपके बच्चों को अन्दर से खोखला कर रहा है, डरा रहा है।
अगर आपको लगता है कि अब भी जादुई परियाँ होती है जिन्न, भूत होते हैं तो आप ख़ुशी-खुशी से इन अंधविश्वास को follow कर सकते हैं।
यह जरुरी नहीं है कि जिन लोगों का एक्सीडेंट होता है उन सभी का रास्ता बिल्ली ने ही काटा हो; और यह भी जरुरी नहीं है कि बिल्ली के रास्ता काटने के बावजूद भी जो लोग निकल जाते हैं उन सभी का एक्सीडेंट होता हो।
भाई एक्सीडेंट या कोई हादसा अंधविश्वास की वजह से नहीं यह होता है यह होता है तो सिर्फ इत्तेफाक से...!!!
इसलिए आज अंधविश्वासों का कोई मोल या मतलब नहीं है!!! बस आप अपनी रास्ता अच्छे से चलिए अंजाम भी अच्छा ही होगा।
वैसे मेरे अनुसार इन अंधविश्वासों को follow ना करो तो ही अच्छा है फिर आगे आपकी मर्जी...!!!
अगर आप इस लेख के बारे में कुछ comments करना चाहते हैं तो सोचिए मत; post कीजिये अपनी comments; और उसके दूसरे दिन अपनी    समस्या का solution लीजिये।
--------------------अतुल राठौर।

Sunday, 14 August 2016

Awareness is a term that makes us great

जागरूकता एक ऐसा शब्द - जो हमें महान बनाता है।

स्टोरी 01 :- 

वह एक 20 वर्ष का युवक था जो किसी होटल मैनेजर से बहस करने में उलझा हुआ था। सामान्य लोगों की तरह मुझे भी उस युवक की बहस बेमतलब लगी लेकिन उस बहस की सच्चाई तो मुझे तब पता चली जब वह मेरे साथ उस बस में चढ़ा जिसमें मैं यात्रा कर रहा था।
और इत्तेफाक से मेरे बगल वाली सीट पर बैठ गया।
थोड़ी देर यात्रा करने के बाद वह मेरे से कुछ बातें करने लगा तो मैंने भी दिलचस्पी दिखाते हुए उसे उसकी और मैनेजर के बीच हुई बहस का कारण जानना चाहा; तो उसने गर्व के साथ खुशी-खुशी वह कारण बताना शुरू कर दिया :- "जब बस होटल पर रुकी तो मुझे भूख का आभास हुआ तो मैंने मैनेजर के पास रखी उस मेनू लिस्ट को देखा जिसमें ₹150 की 1 भोजन थाली थी; जिसमें शामिल 4 रोटी, दो सब्जी तथा सलाद लिखा हुआ था।
मैंने वह थाली आर्डर कर दी; जब थाली आई तो मैंने देखा कि सलाद के नाम पर तो सिर्फ प्याज ही थी और रोटियाँ भी सिर्फ तीन थी।
पहले एक पल के लिए तो सोचा कि चलो एक रोटी कम है एक से कुछ नहीं होता लेकिन अगले ही पल ख्याल आया कि ये तो सामान्यतः सभी लोगों की सोच रहती है; आखिर यह ठीक नहीं अगर हम पढे लिखे लोग जागरुक नहीं होंगे; तो ये होटल संचालक लोग अपनी मनमानी करते रहेंगे।
इस मनमानी को रोकने के लिए मैं सीधा मैनेजर के पास गया और सभी ग्राहकों के समक्ष मैंने मैनेजर के सामने अपनी बात रखी; और कहा कि ₹150 की थाली होने के बावजूद भी हमें चार रोटी के नाम पर है सिर्फ तीन रोटी दी जा रही हैं।
हालांकि सभी ग्राहकों के समक्ष मैंने ये बात कही थी तो मैनेजर यह मानने को तैयार नहीं हुआ कि मुझे सिर्फ तीन रोटीं ही दी गई हैं।
और वह मुझ से बहस पर उतारू हो गया लेकिन मैं भी अपनी बात पर अडिग रहा।
तभी मेरी जागरूकता से संतुष्ट होकर एक व्यक्ति हाथ में थाली लिए उपस्थित हुआ और सभी को उस थाली की दाल को सुंघाते हुए बोला कि इन भाई साहब (मतलब मेरी) की बात सही है और आखिर यह दाल भी तो ताजी नहीं है बदबू दे रही है यह सुनकर तो मानो होटल मैनेजर के होश उड़ गए; और उड़ते भी क्यों नहीं अगर फिर कोई दूसरी टिप्पणी करता तो तीसरा ग्राहक न जाने क्या लिए पहुंच जाता!!! आखिरकार मैनेजर शर्म से पानी पानी हो गया और अपने होटल कर्मचारियों द्वारा की गई गलती की क्षमा मांगी और सभी कर्मचारियों को आदेश दिया कि आगे से ऐसा न करें।"
बस यही बहस हुई थी मेरी उस मैनेजर के साथ और इतना कहते हुए युवक मेरे से बोला कि मैंने कुछ गलत तो नहीं किया भाई!!!
इस पर मैंने उसके आत्मविश्वास को बढ़ावा देते हुए कहा कि तुम्हारे जैसा जागरुक हर व्यक्ति हो जाए तो देश में भ्रष्टाचार पनप ही नहीं पाए।
फिर वह मेरे को धन्यवाद देते हुए हमारी भी कोई स्टोरी जाने की चेष्टा करने लगा।
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दोस्तों यह छोटी बात हो सकती है; यहाँ बात सिर्फ एक रोटी की नहीं जागरूकता की है।
इसलिए ऐसी छोटी छोटी बातों को हमें नजरंदाज नहीं करना चाहिए।
अगर अगली बार मौका पड़े तो हमें हमारा वह छोटा सा हक़ भी छीन लेना चाहिए।
जय हिन्द। 

Wednesday, 3 August 2016

we & our traffic rules

we & our traffic rules

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हम और हमारे traffic rules

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आज के अधिकतर लोग पढ़ाई करते हैं तो सिर्फ जानकारी पाने के लिए; ना कि उस जानकारी को यथार्थ रूप से अपने जीवन में अनुसरण के लिए।
आज का प्रत्येक व्यक्ति traffic rules को सिर्फ जानकारी के तौर पर जानता ही है। इनमे से कुछ ही व्यक्ति होंगे जो उनका यथार्थ रूप से पालन करते होंगे और जिस वक्त वह traffic rules का पालन करते हैं तब यकीन मानिए उन्हें बहुत खुशी होती है, बहुत गर्व होता है कि वह अपने देश के एक जागरुक नागरिक हैं।
ये खुशी और ये गर्व मैं प्रत्येक दिन महसूस करता हूं जब मैं अपने घर से कॉलेज के लिए निकलता हूं क्योंकि मैं जितना हो सकता है उतना traffic rules का पालन करता हूँ।
यह खुशी और यह गर्व आप भी महसूस कर सकते हैं और वह भी वैद्य रूप से। लेकिन इस की शर्तों को आप बोझ मानकर नहीं बल्कि अपना कर्तव्य मानकर करें। इसके लिए आपको negative think छोड़ positivity से सोचना होगा।
जैसे कि:-
1. आप हेलमेट नहीं लगाते शायद सोचते हैं कि hair style खराब हो जाएगी या फिर सिर बहुत भारी हो जाएगा जबकि सोचना ये चाहिए कि hair style से अधिक मुझे अपनी जिंदगी से प्यार है और हेलमेट लगाना अनिवार्य है।
ये video भी देखें....शायद आप इससे inspire हो जाएँ...!!!

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2. आप लोगों की भीड़ में रफ्तार से Bike निकालते हैं, शायद सोचते हैं कि ऐसा करने से लोग मेरी तारीफ करेंगे लेकिन याद रखिए तारीफ से कहीं अधिक लोग गालियां देते हैं।
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3. आप सड़क पर टूटी हुई रेलिंग से पुलिस को चकमा देकर निकल जाते हो। जबकि जागरूकता ऐसी होनी चाहिए कि अगर पुलिस वाले traffic पर न भी हों तो भी हमें टूटी रेलिंग से न निकलकर; सही रास्ते से ही निकलना चाहिए।
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4. Bike पर तीन या चार लोगों को बैठाकर जहां पुलिस मिलती है तो उससे कुछ दूर पहले ही एक या दो लोगों को बाइक से उतार देते हो और Bike को पुलिस वालों के सामने से निकाल कर फिर कुछ दूरी पर खड़ी कर देते हो। तब तक, जब तक कि आपके पैदल वाले साथी नहीं आ जाते; और आप फिर से 4 लोग बैठकर खुशी-खुशी पुलिस को चकमा देकर निकल जाते हैं। और अपने आपको तीस मार खां समझने लगते हैं।
लेकिन यहां आप की तुलना तीस मार खां से नहीं बल्कि स्कूल के उस शैतान विद्यार्थी से की जाती है जो सिर्फ डंडे की भाषा समझता है प्यार की नहीं।
उसी तरह आप भी ट्रैफिक रूल्स का पालन तब तक नहीं करते जब तक कि डंडा यानी कि पुलिस आप को नहीं दिख जाती।
क्या जरूरी है!!! कि जब तुम्हें पुलिस देखेगी तभी traffic rules का पालन करोगे।
नहीं!!! सिर्फ खुद जागरुक बनो ऐसे जागरुक कि traffic police की जरुरत ही ना पड़े।
और अपने मन में ये ख्याल कभी ना लाओ कि वो चार जा सकते हैं तो हम क्यों नहीं; बल्कि ये ख्याल जरूर लाओ कि वह चार शैतान student (गैर जागरूकता वाले) हैं।
और वह सिर्फ डंडा (पुलिस) की मुठभेड़ से ही सुधरेंगे।
जरुरी नहीं कि ठोकर लगने (police को 1000-2000₹ देने) के बाद ही सुधरो पहले ही सुधर जाओ तो ठीक है।
क्योंकि किसी महापुरुष ने कहा भी है :- "मूर्ख अपनी गलतियों से सीखते हैं जबकि महान तो वो लोग होते हैं जो दूसरों की गलतियों से सीखते हैं।"
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friends, मेरे कहने का आशय ये है कि हम सभी rules का पालन नहीं कर सकते लेकिन कुछ rules तो follow कर सकते हैं ना!!! बस कुछ ही rules follow करिए , थोड़ी सी परेशानी के बाद मैं आपसे वादा करता हूँ कि आपको अपने indian होने पर गर्व होगा।
जय हिंद

Sunday, 31 July 2016

Technology>mobile>internet>whatsapp then we

Technology>mobile>internet>whatsapp then we

टेक्नोलॉजी>मोबाइल>इन्टरनेट>वाट्सएप then हम

इसलिए हैं हम टेक्नोलॉजी के गुलाम...


टेक्नोलॉजी - एक वरदान ही था; वैसे जब भी किसी टेक्नोलॉजी का आविष्कार होता है तो अधिकतर केशों में उसके दुष्प्रभाव को नजरअंदाज कर सिर्फ उसके फायदों की बात होती है।
आज हम टेक्नोलॉजी का एक उदाहरण लेकर उसके वरदान या अभिशाप पर बात करते हैं। उदाहरण - जैसे कि मोबाइल।
मोबाइल; आज के युवा वर्ग या यूं कहें कि हर वर्ग के लोग इसका इस्तेमाल करते हैं, जिस तरह से लोग इसके दीवाने हैं तो सिर्फ दीवानगी तक ठीक है लेकिन जब बात गुलाम पर आती है तो कुछ ठीक नहीं।
जी हां; आज जिस तरह से स्मार्ट फोन का उपयोग हो रहा है, उसे टेक्नोलॉजी नहीं बर्बादी कहेंगे।
मोबाइल आज खुद को मनुष्यों का स्वामी समझ बैठा है। और उसे यह समझ हम इंसानो ने ही दी है; जिस प्रकार हम ने उसके अंदर Apps के भंडार भरे हैं, ठीक उसी प्रकार मोबाइल ने भी हमें उस भंडार में उलझा रखा है, और हम भी रात भर उस पर काम करते रहते हैं, Apps में उलझे रहते हैं, वीडियो गेम, facebook, whatsapp और न जाने क्या-क्या करते हैं।
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मोबाइल एक प्रकार से इंसानों को अपनी तरफ आकर्षित करता है और कहता है - कि आओ मेरे बहुत सारे काम हैं, इन्हें निपटा दो। और उनके आदेश को हम पूरा करने लग जाते हैं मतलब facebook और whatsapp चलाने लगते हैं, और मोबाइल के इस आदेश को हम इतने गंभीर तरीके से लेते हैं कि कभी-कभी तो फेसबुक, whatsapp चलाते समय रात के 1:00 या 2:00 बज जाते हैं लेकिन कार्य फिर भी समाप्त नहीं होता।
अगर हम इस तरह अपने लक्ष्य को पूरा करने में रात के 1:00 या 2:00 बजा दें तो कौन कहता है कि हमारा लक्ष्य पूरा नहीं होगा।
लेकिन हमें लक्ष्य कहां, हमें तो वह facebook पर दोस्तों का hi, hello और whatsapp पर फनी वीडियो चाहिए होते हैं।
जब हम whatsapp का इस्तेमाल करना नहीं चाहते तब भी whatsapp की नोटिफिकेशन हमें थोड़ा डिप्रेशन में डाल देती है।
और हम इस डिप्रेशन से छुटकारा पाने के लिए मतलब वाट्सएप की नोटिफिकेशन को लॉक करने के लिए एक और नया सॉफ्टवेयर डाउनलोड कर लेते हैं।
इस प्रकार हम टेक्नोलॉजी से छुटकारा पाने के लिए टेक्नोलॉजी का ही उपयोग करते हैं। बावजूद दोहरी टेक्नोलॉजी के हम अपने हाथ मोबाइल की स्क्रीन पर थिरकने से नहीं रोक पाते, इसकी मुख्य वजह यह है कि हम सोचते हैं कि आज कुछ पढ़ने या एंजॉय करने को कुछ नया मिलेगा और इस नए के भ्रम में डेटा ऑन करते ही हम whatsapp नामक अथाह सागर में डुबकी लगा देते हैं।
फिर उस से बाहर निकलना कठिन साबित हो जाता है। नया जानना अच्छा है लेकिन नए के भ्रम में पुराना भूल जाना उससे भी बुरा है।
अच्छा होगा कि हम कम भले ही जाने लेकिन काम का जाने तो इससे बड़ी उपलब्धि क्या होगी?
"आवश्यकता आविष्कार की जननी है" सही बात है लेकिन आज आविष्कार को मनुष्य ने खुद के लिए अभिशाप बना लिया है खासकर कॉलेज गोइंग स्टूडेंट्स इसके शिकार बने हुए हैं। (This article posted by Atul rathor)
आज जिस व्यक्ति का facebook या whatsapp पर अकाउंट नहीं है, उसे सभी पिछड़ा हुआ मानते हैं।
हो सकता है कि वह पिछड़ा हुआ हो लेकिन आप भी आगे नहीं हो क्योंकि आप भी whatsapp पर अकाउंट बना कर उसमे उलझ गए हो, उसके गुलाम बन गए हो।"
'नेट का कीड़ा' कहा जाने से बेहतर है कि लोग हमें कहें कि इसे 'कुछ भी नहीं आता' क्योंकि 1 दिन बाजी वही मार के ले जाता है; जिन्हें अक्सर कुछ भी नहीं आता।
अब पता कैसे चले कि मोबाइल हमारा गुलाम है या हम मोबाइल के।
अगर कोई व्यक्ति दिन भर में 5 घंटे से ज्यादा मोबाइल का उपयोग करता है, तो उसे मोबाइल का गुलाम ही कहेंगे; इसके उलट वह 5 घंटे से कम मोबाइल का उपयोग करता है तो वह मोबाइल को अपना गुलाम बनाए रखता है।
अब फैसला आपके हाथ में है- गुलाम बनना है या बनाना है।
हो सके तो टेक्नोलॉजी को अपना गुलाम ही रहने दो, इसको अपने ऊपर हावी मत होने दो। वरना शंकर की रोबोट फिल्म जैसा नजारा देखना पड़ सकता है और वह भी वास्तव में।
इस लेख को लिखने के पीछे सिर्फ मेरा यही उद्देश्य है- कि टेक्नोलॉजी से छुटकारा पाने के लिए टेक्नोलॉजी का नहीं बल्कि अपने दृढ़ संकल्प का सहारा लेना होगा,।
तभी हम टेक्नोलॉजी का अपना गुलाम बना पाएंगे।
जय हिन्द।