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Sunday, 22 January 2017

एक माँ की परेशानी

कहानी :- जिसमें आप मिलेंगे खुद से...

एक माँ की परेशानी...

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सोनू महज 12 वर्ष का होगा ; वो खूब खाता पीता भी है और अपनी माँ की प्रत्येक बात को मानता भी है लेकिन जब उसकी माँ उसको रोज शाम को दूध से भरा गिलास देती हैं तो वह ऐसे मुँह बना लेता है जैसे कि माँ उसे दूध नहीं बल्कि कोई कड़वी दवा मिलाकर पिला रही हों।

खैर, सोनू सब जानता है कि दूध सेहत के लिए बहुत ही लाभदायक होता है लेकिन क्या करे...?? वह उसे अच्छा ही नहीं लगता।
कभी कभी तो वह माँ से दूध का गिलास लेकर साइड में रख देता है और माँ से बोल भी देता है कि अभी पी लूंगा; माँ जब-जब सोनू को इस तरह दूध देकर गईं थीं तब-तब सोनू ने उस दूध को कभी नहीं पिया।
वो सुबह तक बस यूँ ही रखा रहता जब तक कि उसकी मां उसे सुबह उठाने के लिए उसके रूम में नहीं जाती।
जैसे ही माँ दूध से भरा गिलास सुबह देखती तो थोड़ा खीझ उठतीं और उसे उठाते हुए कहतीं कि तुमने कल रात दूध क्यों नहीं पिया था..??
सोनू भी आँखे मलते हुए कोई बहाना खोज लेता और कहता ओहो माँ वो मैंने रात को पढ़ाई की थी ना सो याद नहीं रहा...sorry.
माँ उसकी sorry को सुनकर उसे माफ कर देती लेकिन मन ही मन सोचती कि पता नहीं कभी इसे दूध अच्छा लगेगा भी या नहीं लेकिन एक बात तो तय है कल से मैं इसके रूम में दूध रखूंगी नहीं बल्कि जब तक ये दूध पी नहीं लेता तब तक वहीँ बनी रहूंगी।
और इधर सोनू भी सोचता कि पता नहीं मुझे ये दूध कब अच्छा लगेगा..??
और फिर एक दिन ऐसा आ ही गया कि माँ और बेटे दोनों की ही मुराद पूरी हो गई।
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दरअसल सोनू को dance करना और cartoon देखने का बड़ा शौक है लेकिन अगर बात फिल्मी hero की की जाए तो उसे tiger shroff बहुत ही पसंद है।
सोनू अपने star tiger से मिलना चाहता था; लेकिन कैसे...???
आखिर उसे वो मौका मिल ही गया जब उसे पता चला कि अगले dance competition में tiger shroff guest हैं तो उसने भी अपनी माँ से dance competition में हिस्सा लेने की बात जाहिर की।
वैसे सोनू बहुत ही अच्छा dance करता था और regular ही practice भी किया करता था तो माँ की भी ना कहने की इच्छा नहीं हुई।
और दोनों पहुँच गए dance competition में।
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खैर; सोनू उस dance competition में कोई खाश performance तो नहीं कर पाया लेकिन आखिर में उसे अपने favorite star tiger से बात करने का मौका जरूर मिल गया।
उसने बस ऐसे ही tiger से उनकी सेहत का राज पूछा तो tiger ने भी normal तरीके से उसका जवाब दे दिया कि वो शाम को दूध और फल अवश्य खाते हैं।
फिर 2-4 नॉर्मल बातें करके सोनू और माँ अपने घर वापस आ गए।
माँ थोड़ी उदास थी क्योंकि उसका बेटा competition में नहीं जीत सका लेकिन सोनू बहुत खुश था क्योंकि वह तो बस अपने favorite star को देखना और उनसे बातें करना चाहता था।
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खैर, रोजाना की तरह माँ फिर से सोनू के लिए दूध का गिलास लेकर आई।
आज दूध से भरा गिलास देखकर ही सोनू का चेहरा खिल उठा लेकिन ये क्या पल भर में उतर भी गया।
उसने थोड़ा हैरानी के साथ माँ से कहा कि आज कुछ फल भी तो लेकर आतीं।
तो माँ ने भी हैरानी से कहा - क्यों मैं रोजाना सिर्फ दूध ही तो देती हूँ..!!
सोनू बोला :- अरे माँ आप शायद ध्यान भूल गईं कि tiger ने क्या कहा था..???
सोनू के मुंह से tiger का नाम सुनकर ही माँ को सब कुछ याद आ गया।
माँ :- लेकिन बेटे आज फल तो घर में हैं नहीं..!!!
सोनू :- अरे कोई बात नहीं माँ..!!! लेकिन कल से ध्यान रखना; और हाँ कल से दूध भी सिर्फ एक गिलास ही नहीं बल्कि दो गिलास देना..😊😊
ये सुनकर ही माँ को इतनी खुशी का एहसास हुआ कि मानो उसने बहुत बड़ा खजाना पा लिया हो।
माँ सोनू से प्यार भरी मुस्कान से बोली :- हाँ क्यों नहीं...अवश्य दूँगी।
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और फिर दूसरे दिन से ही माँ सोनू को एक नहीं बल्कि दो गिलास दूध और फल देने लगी और सोनू भी अब दूध को बोझ मानकर नहीं बल्कि tiger जैसा बनने के लिए पीता था😊😊😊
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तो friends ये तो रही सोनू और उसकी माँ की कहानी।
वैसे ऐसी ही हम सबकी कहानियां हैं।
हम भी किसी न किसी बात में अपने माँ-बाप या फिर किसी ऐसे करीबी व्यक्ति की बातों को ignore कर देते हैं; जो वाकई ही हमारे हित में होती हैं ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम उनकी बातों को बोझ समझते हैं।
जबकि वही बात हमारे किसी favorite star या फिर किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा बोली जाए जिसे हम अपना idol (आदर्श) मानते हैं तो उसी बात को हम ऐसे follow करते हैं जैसे कि हमारी जिंदगी में बस यही बात मायने रखती है।
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वैसे हमारे अंदर भी अच्छी बातों का असीमित भंडार भरा हुआ है लेकिन हम उसका उपयोग नहीं करते क्योंकि हम भी कहीं न कहीं सोनू की तरह अपने idol की बात मानने का इन्तजार करते हैं।
और idol भी वही सलाह देते हैं जो हम पहले से जानते हैं लेकिन मानते नहीं।
जरा सोचें...!!!
ऐसा क्यों...???
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इस article को लिखने का यही उद्देश्य है कि जरुरी नहीं कि हम हमेशा अपने idol द्वारा कही गई बातें ही मानें हम हमेशा वो ही बातें मानें जो वाकई ही सही है फिर चाहे वो बात हमारे idol द्वारा कही गई हो या फिर किसी अजनबी द्वारा...!!!
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So friends, इस ब्लॉग के thought आपको कैसे लगे कृपया comments के माध्यम से मुझे अवश्य बताइयेगा और हाँ जितना हो सके इस ब्लॉग को follow कीजियेगा।
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जय हिंद।
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इन्हें भी पढ़ें :-
01.किसान पिता की दुविधा
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02.माँ के लिए वास्तविक और दिखावटी प्रेम
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03.एक कदम आगे
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04.जरा सोचें...!!! क्यों हम अच्छी बातों को follow नहीं कर पाते..??

Sunday, 23 October 2016

एक किसान पिता की दुविधा😥

किसान पिता की दुविधा...

काफी पढ़ा लिखा होने के बावजूद भी जब उसे अपने ओहदे ही नौकरी नहीं मिली तो वह घर पर ही अपना समय बिताने लगा...!!!
कहीं वो अपने दोस्तों के साथ घूमने चला जाता तो कहीं वो घर पर ही आराम से लेटकर सो जाता।
इसी तरह चल रही थी उसकी जिंदगी।
जबकि उसके पिता एक किसान थे।
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उसे इस तरह जिंदगी जीते देखकर उसके पिता से रहा न गया और उसे एक दिन समझाते हुए बोले कि बेटा इस तरह घर पर रहना कोई अच्छी बात नहीं है।
आपको अगर कोई पढ़ी लिखी नौकरी नहीं मिल रही है तो क्या..!!!
तब तक आप मेरे साथ मेरे काम में हाथ बँटा सकते हो!!!
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बेटे को यह सुनकर ही गुस्सा आ गया और झल्लाते हुए बोला :- आपने इसीलिए पढ़ाया था मुझे..??
ताकि मैं भी आपकी तरह खेती कर सकूँ..??
मैं काफी पढ़ा लिखा हूँ ; अब आप ही बताइए कि मुझे इस तरह खेती-बाड़ी करना शोभा देगा क्या..???
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अनपढ़ पिता, बेटे की ऐसी बातें सुनकर कोई जवाब न दे सका और वहां से चलता बना।
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लेकिन किसान पिता के मन में एक ही दुविधा रहती थी कि मेरा लड़का आखिर इतना पढ़ा लिखा होने के बावजूद भी मेरी भावनाओं को क्यों नहीं समझता है; वो ऐसा क्यों समझता है कि मैं भी उसे एक किसान बनाना चाहता हूँ।
अगर ऐसा होता तो मैं उसे पढ़ाता ही क्यों..???
मैं तो सिर्फ उसे इतना समझाना चाह रहा था कि जब तक उसे उसकी मनपसंद की नौकरी नहीं मिल जाती तब तक वह मेरे साथ; मेरे काम में हाथ बँटाये लेकिन वो तो मेरी बात को हमेशा गलत ले जाता है आखिर यह कब समझेगा मेरी भावनाओं को..??
ऐसा सोचते-सोचते पिता की आँखे आंसुओं से नम हो गईं।
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अचानक ही रास्ते में पिता को उनके मित्र टकरा गए; जब पिता ने उन्हें देखा तो झट से अपने आंसू पोंछ लिए ..!!!
लेकिन इन आंसुओं को पोंछते हुए उनके मित्र ने देख लिया था।
और बोले कि यार..!!! ये आंसू क्यों बहा रहे थे???
पिता (बनने का नाटक करते हुए) :- आंसू...!!! नहीं तो..!!!
मित्र :- देखो..!!! जो है उसे सच सच बता दो कुछ छुपाओ मत...समझे!!!
इस पर पिता ने सब बातें अपने मित्र को बता देना ही उचित समझा।
और अपने बेटे की सारी कहानी कह सुनाई।
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ये सब सुनकर उनके मित्र भी काफी भावुक हो गए; और उन्होंने कहा :- तुम चिंता मत करो ; आपके बेटे को मैं समझा दूंगा।
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दूसरे दिन वो मित्र ; अपने मित्र (पिता) के घर पहुंचे।
वहां पर वो लड़का उस वक़्त खाना खा रहा था।
खाना खाने के बाद लड़के ने उनके पैर छुए और बोला कि अंकल!! आज कैसे आना हुआ..???
कोई खाश बात???
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अंकल(मित्र) :- कुछ नहीं!!! बस इधर से निकल रहा था कि सोचा कि आपके हाल -चाल पूछता चलूँ!!! और क्या कर रहे हो आजकल???
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लड़का :- कुछ कर ही तो नहीं रहा..!!! बस किसी नौकरी की तलाश में ही हूँ।
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अंकल :- अरे जब तक नौकरी नहीं मिलती तब तक आप कुछ और काम कर लो..!!!
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लड़का :- कुछ और काम..!!! जैसे कि..???
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अंकल :- जैसे कि आप अपने पिता के साथ खेती में उनका हाथ बँटा सकते हो या फिर मेरे साथ कपड़ों की बिक्री करवा सकते हो!!!
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लड़का (खिशियाहट भरी मुस्कान के साथ) :- अंकल इतना पढ़ा लिखा हूँ और आप मुझे ये कैसा काम करने के लिए कह रहे हो??
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अंकल :- बेटा मैं जिंदगी भर ये काम करने के लिए थोड़े ही कह रहा मैं सिर्फ तब तक कह रहा हूँ जब तक कि आपको अपनी मनपसंद की नौकरी नहीं मिल जाती।
और वैसे भी आप घर पर रहकर क्या करते होंगें...??
या तो फिजूल घूमते होंगे या फिर सोते होंगे..???
इससे तो अच्छा है कि आप कुछ सीखो भले ही वो काम अनपढ़ वाला ही क्यों ना हो।
क्योंकि आज जो काम आपके पिता और हम कर सकते हैं वो आप नहीं..??
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लड़के को उनकी बात जँच गई और वह दूसरे ही दिन पिता के साथ उनका हाथ बँटाने को तैयार हो गया।
ये सब देखकर पिता की आँखे खुशी से दमक उठीं थीं इसलिए नहीं कि अब उनका बेटा उनके साथ खेती करेगा बल्कि इसलिए कि अब उनका बेटा उनकी भावनाओं को समझ गया था।
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Friends, अक्सर ऐसा हम भी करते हैं, जब हम अधिक पढ़ लिख जाते हैं और कोई अच्छी नौकरी नहीं मिलती तो घर पर फिजूल ही पिता की कमाई की रोटियां तोड़ते रहते हैं जबकि हमको करना ये चाहिए कि अगर हमें कोई मनपसंद job नहीं मिल रही है तो तब तक वो job करनी चाहिए जो हमें मिल रही है।
ना ना ना..!! जिंदगी भर नहीं.....सिर्फ तब तक; जब तक कि हमें हमारी मनपसंद job नहीं मिल जाती।
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अगर आपको यह blog पसंद आया हो तो comment करना ना भूलें।
शायद आपको नहीं पता कि एक blogger को आपका positive comment कितनी ख़ुशी देता है।
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जय हिंद।

इन्हें भी पढ़ें :-
1.मेरे सुधरने से क्या; दुनियाँ सुधर जाएगी...!!
2.एक माँ की परेशानी...
3.जरा सोचें - एक अनकही कहानी
4.जरा सोचें...!!! क्यों हम अच्छी बातों को follow नहीं कर पाते..??

Monday, 26 September 2016

नई सीख

किसी आश्रम में एक गुरूजी अपने शिष्यों को धनुर्विद्या (archery) सिखाया करते थे।
शिष्य भी रोजाना धनुष-बाण का अभ्यास किया करते थे, और रोज एक नई विद्या सीखा करते थे!!

एक दिन गुरूजी ने सभी शिष्यों को अपने पास बुलाया और कहा कि आज मैं किसी को धनुर्विद्या नहीं सिखा रहा लेकिन धनुर्विद्या से सम्बंधित ही कुछ बातें बताऊँगा।
इसलिए सभी लोग अपने धनुष-बाण एक तरफ रख दें।
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सभी शिष्यों ने भी अपने धनुष-बाण एक तरफ रख दिए।
फिर गुरूजी उन्हें धनुर्विद्या की कुछ बारीकियाँ समझाने लगे...!!!
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जब बारीकियाँ समझाते-समझाते पूरा समय निकल गया तो एक शिष्य बोला :- "गुरूजी आज का पूरा समय ऐसे ही निकल गया; अगर आप आज भी धनुर्विद्या का अभ्यास करवाते तो हम एक कला और सीख जाते लेकिन आप ये छोटी-छोटी बातें क्यूँ सिखा रहे हैं क्या होगा इन बारीकियों से...???"
ये सुनकर गुरूजी मन ही मन उसकी मूर्खता पर क्रोधित हो रहे थे।
लेकिन फिर भी उन्होंने अपने क्रोध पर काबू पाते हुए कहा :- वत्स!!! इस बात का जवाब मैं आपको कल दूँगा।
(आप यह Article technic jagrukta वेबसाइट पर पड़ रहे हैं)
सुबह हुई...
सभी शिष्य जल्दी-जल्दी गुरूजी के पास पहुँचे देखा तो; गुरूजी अपने हाथ में दो कुल्हाड़ियाँ लिए हुए थे।
एक शिष्य ने आगे बढ़कर पूछा :- गुरूजी!!! भला ये कुल्हाड़ी क्यों...???
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गुरूजी (कल वाले शिष्य को अपने पास बुलाते हुए) :- वत्स!!! आप जानना चाहते हो ना कि कल मैं वो धनुर्विद्या की बारीकियां क्यों सिखा रहा था।
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शिष्य :- हाँ गुरूजी मैं वो जानना चाहता हूँ।
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इस पर गुरूजी ने अपने एक दूसरे शिष्य को भी अपने पास बुलाया।
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और दोनों शिष्यों को कुल्हाङी देते हुए बोले :- सामने देखो!!! दो सूखे पेड़ हैं; आप दोनों को इन कुल्हाङी से एक-एक पेड़ काटना है अब देखना ये है कि आप दोनों में से पेड़ को कौन पहले काट पाता है।
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पहला शिष्य (जो अपना जवाब चाहता था) जल्दी से पेड़ के पास गया और बिना कुछ सोचे-समझे ही पेड़ को काटने लग गया।
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जबकि दूसरे शिष्य ने देखा कि कुल्हाङी की धार बहुत मोटी है तो वह पेड़ को काटने की बजाय पत्थर पर कुल्हाङी की धार तेज करने में लग गया।
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उधर; कुल्हाड़ी की धार मोटी होने की वजह से पहला शिष्य कुछ ही पल में थक गया; और आराम करने लगा।
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जबकि इधर; दूसरे शिष्य ने कुल्हाङी की धार तेज करके कुछ ही पल में पेड़ को काटकर ढेर कर दिया।
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पहले शिष्य का सिर शर्म से झुक गया था।
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इस पर गुरूजी ने उसे बड़े प्यार से समझाया :- वत्स!!! कुछ समझे..??
इसीलिए हम आपको कल धनुर्विद्या ना सिखा कर; उसकी बारीकियाँ सिखा रहे थे।
क्योंकि अभी तक आपने जो धनुर्विद्या सीखी वो इस मोटी धार वाली कुल्हाङी की तरह थी जिसकी आप बिना धार तेज किये हुए सिर्फ पेड़ को काटे जा रहे थे।
इसलिए कल मैंने सोचा कि क्यों ना आप लोगों की कुल्हाङी की धार को तेज कर दिया जाए जिससे आप पेड़ को जल्दी काट सको।
अर्थात् धनुर्विद्या की बारीकियां सीखकर आप धनुर्विद्या में निपुण हो सको।
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सभी शिष्य गुरूजी की बात को अच्छी तरह समझ चुके थे, और किसी भी कार्य को करने से पहले; उसे किस तरह किया जाए ये भी समझ गए थे।
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friends, बिल्कुल ऐसा ही हमारे साथ भी होता है; जब हमें कोई कार्य दिया जाता है, तो हम कोई strategy बनाने से पहले उसे पूरा करने में लग जाते हैं, दरअसल काम तो पूरा हो जाता है लेकिन हम उस काम में निपुण नहीं हो पाते।

इसलिए किसी भी कार्य को करने से पहले उसके बारे में पल दो पल सोचना बहुत जरुरी है; उसकी strategy बनाना बहुत जरुरी है, ये सोचना जरुरी है कि उस काम को किस तरह से किया जाए ताकि वो जल्दी finish हो सके।
इसका मतलब ये नहीं कि 2 मिनट का काम हो और आप सोचने में ही 10 मिनट लगा दो।
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आशा करता हूँ कि आपको मेरा ये blog पसंद आया होगा।
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Saturday, 24 September 2016

कहने, कहने का फर्क

आपके बात करने का तरीका ही बता देता है कि आप दूसरे लोगों के emotions की कदर करते हो या नहीं..!!!
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ऐसी ही एक कहानी है जो हमेशा से ही मुझे motivate करती आई है और किस व्यक्ति से; किस तरह बात करनी है; इसकी भी समझ देती है...!!
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कहानी 01...

"बहुत समय पहले की बात है एक राजा ने एक भविष्यवक्ता को अपने दरबार में बुलाकर उससे अपना भविष्य जानना चाहा...!!!
राजा ने उस भविष्यवक्ता से पूछा - क्या आप बता सकते हैं कि मैं अपने कुल-खानदान में कब तक जीवित रहूँगा?
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भविष्यवक्ता राजा का हाथ देखते हुए बोले :- बधाई हो महाराज!! आप अपने कुल खानदान में सबसे लम्बे समय तक जीवित रहोगे और शाशन भी करोगे।
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इस पर राजा खुश हुआ और उसने अपने गले से मोतियों की माला निकालकर भविष्यवक्ता को दे दी।
मोतियों की माला लेकर भविष्यवक्ता चला गया।
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दूसरे दिन राजा ने सोचा कि कहीं उसने मेरे डर के कारण तो ऐसा नहीं बोला...??
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राजा ने पहले भविष्यवक्ता की परीक्षा लेनी चाही और उसने दूसरे भविष्यवक्ता को अपने दरबार में बुला लिया।
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राजा ने उससे भी वही प्रश्न दोहराया :- क्या आप बता सकते हैं कि मैं अपने कुल-खानदान में कब तक जीवित रहूँगा?
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दूसरा भविष्यवक्ता भी राजा का हाथ देखते हुए बोला :- बधाई हो महाराज!!! आपके कुल-खानदान के सभी लोग; आपसे पहले मर जायेंगे और वो कभी शाशन भी नहीं कर पायेंगे।
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ये सुनकर राजा आगबबूला हो गया और बोला :- क्या बकते हो..?? बोलने की तमीज नहीं है तुम्हें..??
तुम्हें ऐसा अशुभ बोलने का दंड मिलेगा..!!!
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राजा ने फिर अपने सैनिकों को आदेश दिया कि इस भविष्यवक्ता में 15 कोड़े लगाये जाएँ।
और इस तरह उस भविष्यवक्ता को 15 कोड़े लगाये गए।
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अब आप देख सकते हैं कि दोनों भविष्यवक्ताओं की बात का मतलब तो एक ही था लेकिन उनके बात कहने का तरीका बहुत ही अलग।
सिर्फ बात कहने के तरीके से ही पहले भविष्यवक्ता को ईनाम मिली तो दूसरे को सजा।
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वैसे ठीक ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ।

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My real story 02...
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मैंने कुछ दिन पहले एक blog लिखा तो मैंने अपने एक friend से पूछा कि भाई मेरा ये blog पढ़के बताओ कि कैसा है...??
उसने पूरा blog पढ़ा और बताया कि ये भी कोई blog है एकदम बकवास...!!!
इस पर मैंने कहा :- भाई किस जगह बकवास है बताओ ना plzzz.
फिर उसने कहा :- ये सब मुझे नहीं पता; मैं सिर्फ इतना जानता हूँ कि ये blog बकवास है और इसे कोई अच्छा नहीं बताएगा बस..!!
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मुझे उसकी ये बात सही नहीं लगी।
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और फिर मैंने अपने दूसरे friend से भी वही प्रश्न दोहराया :- भाई मेरा ये blog पढ़के बताओ कि कैसा है...??
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उसने भी पूरा blog पढ़ा और बताया कि अगर इस blog के बीच में कुछ सुधार कर दिया जाए तो और भी अच्छा हो जाए।
जब मैंने फिर से अपने blog को देखा तो वास्तव में ही blog के बीच में correction की जरुरत थी।
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फिर मैंने अपने blog के बीच में correction कर; उन दोनों friends को फिर से पढ़ाया।
अब दोनों blog को अच्छा बता रहे थे।
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यहाँ मुझे पहले friends की बात थोड़ी बेकार लगी जबकि दूसरे friend की बात उतनी ही अच्छी।
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खैर, मेरे दोनों friends के कहने का मतलब एक ही था कि मेरा blog अच्छा नहीं है लेकिन उन दोनों के कहने का तरीका बहुत अलग।
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पहले दोस्त ने blog को बकवास बताकर मुझे थोड़ा confuse किया तो दूसरे दोस्त ने भी वही बात; दूसरे तरीके से बोलकर मुझे राह दिखाई।
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so friends, मेरे कहने का मतलब यही है कि हमें हमेशा पहले भविष्यवक्ता और दूसरे दोस्त की तरह बनना चाहिए और सोच समझकर बोलना चाहिए।
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इस तरह बोलना चाहिए कि सामने वाले तक हम अपनी बात पहुंचा भी दें और उसे बुरा भी नहीं लगे।
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इस तरह सिर्फ सोच समझकर और अच्छा बोलने से हम दूसरों के दिल में अपनी जगह बना सकते हैं।

जय हिन्द।

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